बालिका शिक्षा कहाॅ हैं? हम
भूमिकाः-
समाज का विकास उसमें निहित सम्पूर्ण मानवीय क्षमता का कुशलतापूर्वक उपभोग पर निर्भर करता है। समाज में सभी वर्ग के सहयोग के बिना पूर्ण विकास सम्भव नहीं हो सकता है। खासकर जब बालिकओं को शिक्षा देने की बात हो तो कहाॅ जायेगा कि बालिकाओं को शिक्षा देने के एक और फायदा हैं कि एक परिवार के साथ एक समाज भी शिक्षित होता हैं। सामाजिक एवं आर्थिक ढाँचे के परिवर्तन हेतु शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। स्त्राी समाज का आधा हिस्सा है, आधी दुनिया है, जगत् निर्मात्राी है। यदि हमें अपने संपूर्ण समाज का विकास करना है, तो हम आधी दुनिया को नशरअंदाज नहीं कर सकते हंै। अतः इस आधी दुनिया, यानी महिलाओं का शिक्षित होना अति आवश्यक है। निश्चित रूप से एक शिक्षित महिला अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए संघर्षशील होती है। शिक्षा एक मौलिक अधिकार है, लेकिन सवाल
(छायाचित्र लिया गया है- लर्निग कर्व, अंक 13, अक्टुबर: 2016)
यह उठता है कि जहाँ अभी जन्म के अधिकार के लिए ही लड़कियों को संघर्ष करना पड़ रहा है, तो फिर शिक्षा के अधिकार के लिए तो बहतु प्रयास करने की जरूरत हैं। वर्तमान भारत के इस दौर में शिक्षा का अपना महत्व हैं, खासकर बालिकाओं की शिक्षा, जो की समाज के आधे हिस्से का प्रतिनिधित्व करती हैं। बालिकाओं की शिक्षा और बेहतरी से ही समाज शिक्षित और समृद्ध हो सकता हैं। कहते है कि ’जब आप एक पुरूष कों शिक्षित करते हैं, जब आप एक महिला को शिक्षित करते हैं, तो आप पूरे परिवार को शिक्षित करते हैं’ (जानेट कोल)। भारत जैसे विकासशील देश में जहाॅ गरीबी और अशिक्षा एक भंयकर समस्या है वहाॅ बालिका शिक्षा का महत्व और बढ़ जाता हैं, विशेषतः ग्रामीण क्षेत्रो में जहाॅ आज भी बालिकाओं को शिक्षा आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती हैं।
बालिका शिक्षा: वर्तमान परिदृश्य
1995 की मानव विकास रिपोर्ट में पहली बार लिंग सम्बन्धी विकास को शामिल किया गया जिसमें स्वास्थ्य और दीर्घायु जीवन (संभावित आयु के लिहाज में), शिक्षा (प्रौढ़ साक्षरता तथा कुल भर्ती छात्रों की संख्या के हिसाब में) तथा ठीक ठाक जीवन स्तर (क्रय शक्ति और आय के मुताबिक) जैसे आयाम सम्मिलित है। न्छक्च् की रिपोर्ट (2015) के अनुसार भारत का लैंगिक विकास सूचकांक ;(ळक्प्द्ध 131 वाँ एवं मूल्यांक 0.819 (मध्यम मानव विकास) है।
आज भारत में राष्ट्रीय महिला साक्षरता 65.46 प्रतिशत है। जो पुरूष साक्षरता (82.14 प्रतिशत) की तुलना में काफी कम है। इनमें से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति महिलाओं की साक्षरता क्रमशः 56.46 व 49.36 प्रतिशत अपेक्षाकृत काफी कम है। भारत में महिलाओं एवं पुरूषों के औसत स्कूली वर्ष के बीच लगभग दोगुने का फर्क है जबकि विश्व स्तर पर यह अन्तर काफी कम है। भारत में पुरूषों का औसत स्कूली वर्ष 7.2 वर्ष तथा महिलाओं का 3.6 वर्ष है। जबकि विश्व में पुरूषों का औसत स्कूल वर्ष 7.9 वर्ष तथा महिलाओं का 6.2 वर्ष है (अमर उजाला इलाहाबाद 2 जनवरी 2016, पृ.12)। आज भारत में पुरूष और महिला राष्ट्रीय साक्षरता में 16.68 प्रतिशत का अन्तर है।समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता शिक्षा के क्षेत्र में स्पष्ट दिख रही लैंगिक भेदभावपूर्ण मानसिकता की जड़ है।
आजादी के बा्द से बालिका शिक्षा के संदर्भ में बात की जाये तो बालिका शिक्षा की प्रगति को निम्नलिखित तालिका के द्वारा समझा जा सकता हैं-
वर्ष महिला साक्षरता दर
1951 8.86
1961 15.35
1971 21.97
1981 29.76
1991 39.29
2001 54.16
2011 65.46
(जनगणना 2011 के अनुसार एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2014-15)
आज भारत में राष्ट्रीय महिला साक्षरता 65.46 प्रतिशत है। जो पुरूष साक्षरता (82.14प्रतिशत) की तुलना में काफी कम है। इनमें से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति महिलाओं की साक्षरता क्रमशः 56.46 व 49.36 प्रतिशत अपेक्षाकृत काफी कम है। भारत में महिलाओं एवं पुरूषों के औसत स्कूली वर्ष के बीच लगभग दोगुने का फर्क है जबकि विश्व स्तर पर यह अन्तर काफी कम है। भारत में पुरूषों का औसत स्कूली वर्ष 7.2 वर्ष तथा महिलाओं का 3.6 वर्ष है। जबकि विश्व में पुरूषों का औसत स्कूल वर्ष 7.9 वर्ष तथा महिलाओं का 6.2 वर्ष है (अमर उजाला इलाहाबाद 2 जनवरी 2016, पृ.12)। आज भारत में पुरूष और महिला राष्ट्रीय साक्षरता में 16.68 प्रतिशत का अन्तर है। समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता शिक्षा के क्षेत्र में स्पष्ट दिख रही लैंगिक भेदभावपूर्ण मानसिकता की जड़ है।
बालिका शिक्षा में कैसी हैं स्थिति हमारी?
आज अधिकांश अभिभावक अपनी बेटियों को पढ़ने के लिए स्कूल तो भेजते हैं, पर उन्हें आजादी नहीं देते। शिक्षित परिवारों में भी बेटियों पर अनेक प्रकार की बंदिशें लगाई जाती हैं। बेटियों को भी शिक्षा के साथ आजादी मिले तो पूर्ण आत्मविश्वास के साथ, मुक्त होकर स्वयं कुछ करने, कार्यों में अगुवाई करने तथा स्वतंत्र निर्णय लेने जैसी क्षमताएँ विकसित होते देर नहीं लगती। यदि आज भी हम बच्चियों को स्कूल भेजें तथा योग्यता के अनुसार हर बच्ची को उच्च शिक्षा अथवा शिक्षा ग्रहण करने के अवसर दें, तो हर बच्ची में छिपी हुई इच्छा पंख ले उसे आसमान छूने देगी।
आज के संदर्भ में अधिकतर परिवार बच्चियों को पढ़ाते हैं, पर उन्हें सपने साकार करने की आजादी नहीं दे पाते। वे चाहते हैं कि लड़कियाँ वही सब करें जो उनके माता-पिता चाहते हैं। यदि पैसों का अभाव हो तो उच्च शिक्षा के लिए वे लड़कों को ही प्राथमिकता देते हैं। समाज के बहुत-से व्यक्ति अपने विचारों में इतने संकुचित हैं कि अपने या अपने परिवार के अलावा उन्हें यह चिंता ही नहीं रहती है कि उनके आस-पास क्या हो रहा है? यदि हमारे समाज का हर व्यक्ति अपने या अपने परिवार से ऊपर उठ पाता, तो क्या वह देश के लिए इतनी अधिक महिलाओं का उत्पीड़न और मृत्यु बर्दाश्त करता? यह कैसे सहन कर रहा हैं।
बालिकाओं की वर्ष 1951 से 2011 तक शैक्षिक स्थिति में काफी परिवर्तन हुआ, इन दशको में केवल बालिका शिक्षा के आकडो में ही परिवर्तन हुआ, जबकि उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में मामुली परिवर्तन ही हुआॅ। जिससे समाज में बालिका शिक्षा सम्बन्धि वर्तमान में निम्नलिखित समस्यायें विद्यमान हैं-
ऽ व्यवसायिक शिक्षा में बालिकाओं का कम संख्या में पहुॅच। अधिकाशंतः बालिकाओं को कामचलाऊ शिक्षा ही अभिभावकों द्वारा दी जाती हैं।
ऽ उच्च शिक्षा में बालिकाओं का कम संख्या में नामांकन। शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागु होने के पश्चात बालिकाओं को प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर की शिक्षा उपलब्ध कराई जाती है किन्तु उच्च शिक्षा में आज भी बालिकाओं का नामांकन नाम मात्र हैं।
ऽ ग्रामिण क्षेत्रों में परिवारों की आर्थिक स्थिति का कमजोर होना, जिस कारण ग्रामीण परिवार बालिकाओं की शिक्षा पर बल नही देते हैं।
ऽ लड़को की अपेक्षा लड़कियो की शिक्षा के प्रति भेदभाव पूर्ण रवैया। लड़को को अभिभावक अपने वंश का वाहक मानते है जिस कारण अभिभावको का लड़को के सापेक्ष लड़कियो के प्रति भेदभाव युक्त रवैया रहता हैं।
ऽ घर के कामकाज का उत्तरदायित्व और अर्थोपार्जन संबंधी गतिविधियो में संलग्नता। प्रारंम्भिक शिक्षा प्राप्त बालिकाओं को परिवार के लोग महिलाओं का हाथ बटाने के लिए घर के काम काज में लगा देते हैं।
ऽ सामाजिक मानसिकता का रूढि़वादी होना। खास कर भारतीय समाज की यह मानसिकता रही है कि लड़किया पराया धन है शादी के बाद उन्हें दुसरे घर जाना है।
ऽ ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल का घर से दूर स्थित होना। वर्तमान में कई ग्रामीण इलाकों में स्कूल घर से मीलों दूर है जिससे अभिभावक लड़कियों को विद्यालय भेजने संकुचातें हैं।
ऽ समाज में बालिकाओं के प्रति असुरक्षा का वातावरण।
ऽ विद्यालयों में महिला शिक्षिकाओं की अल्प संख्या का होना। महिला शिक्षिका न होने के कारण अधिकतर अभिभावक सुरक्षा के दर के कारण लड़कियों को विद्यालय छुडवा देते हैं।
ऽ बालिकाओं के लिए आवासीय विद्यालय एंव छात्रावास की कमी।
ऽ लड़कियों के साथ यौन उत्पीड़न की बढ़ती घटनाये। विद्यालय में शिक्षक रूप में अधिकाशतः पुरूष ही होते है जिस कारण बालिकाओं के प्रति यौन उत्पीड़न की समस्यायें दिन प्रतिदिन बढती ही जा रही हैं।
ऽ महिलाओ के प्रति होने वाली हिंसा दर में वृद्धि। घरेलु हिंसा इसका एक प्रमुख कारण हैं।
निष्कर्ष:
निष्कर्षतः हम कहेगे कि आधुनिक वैश्विक समाज में पुरूष तथा महिला को एक गाड़ी के दाएॅ व वाएॅ वाले दो पहियो के समान माना जाता है। इसमें से एक भी पहिया के खराब होने से इस सांसारिक गाड़ी को सर्वोत्तम तरीके से आगे बढाना कदापि सम्भव नहीं हो सकता है। भारतीय समाज में महिलाओ की स्थिति में सुधार करना हैं, तब उन्हें ज्यादा से ज्यादा गुणवत्तायुक्त शिक्षा एवं शैक्षिक मौहोल प्रदान करना होगा। राष्ट्र को उन्नति के रास्ते पर ले जाना है तब महिलाओ की आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक स्थिति में सुधार करना होगा। कदाचित स्वतंत्रता के बाद के समय का अध्ययन किया जाता हैं, यद्यपि प्राप्त होता है कि बालिकाओं की शैक्षिक एवं सामाजिक स्थिति में आमुल-चुल ही परिवर्तन हुआॅ हैंै। बालिकाओं की साक्षरता स्तर बढा है किन्तु अभि शिक्षित करना रह गया हैं। बालिकाओं का व्यवसायिक, प्रौद्योगिकी एवं चिकित्सा शिक्षा से जोड़ने का कार्य शेष हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बालिकाओं को सुरक्षात्मक वातावरण प्रदान किया जाए जिससे बालिकाओं को विद्यालय जाने में सुविधा हो तथापि अभिभावकगण बालिकाओं को विद्यालय भेजने को प्रेरित हो। अन्ततः हम यही कहेगे कि बालिका शिक्षा के विकास हेतु हम चार कदम ( आधा रास्ता) चल चुकें है और चार कदम चलना बाकी है जिसे तीव्र गति के साथ चलकर पुरा किया जाये यद्यपि हमारा राष्ट्र विश्व के अग्रणी देशो के बराबरी में आ खड़ा हो।
यह आलेख सेतु पत्रिका में वर्ष 2018 के जुलाई अंक में प्रकाशित हुवा था

Comments
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें