यह शोध आधुनिक प्राथमिक शिक्षक पत्रिका में प्रकाशित है

पत्रिका को इस लिंक से डाउनलोड किया जा सकता है 


शोध को यहाँ प्रकाशित करने का एक मात्र उद्देश्य शोध को प्रचारित करना है सभी प्रकार का कापी राईट पत्रिका के पास है

बच्चों की शिक्षा में शिक्षक-अभिभावक  सबंध की भूमिका: एक विश्‍लेषण

प्रस्तुत शोध पूर्णतः प्राम्भिक शिक्षा (कक्षा-1 से 8) को केन्द्रविंदु में रखकर किया गया है । शोध में शोधार्थी ने बतलाया है कि- बच्चों की शिक्षा में अभिभावक शिक्षक संबंध का अच्छा होना बच्चों की शिक्षा के लिए सकारात्मक होता है । शोध में वर्णित शिक्षक अभिभावक संबंध से शोधार्थी का आशय है कि अभिभावकों एवं शिक्षकों के मध्य संपर्क से । जब हमारे मन में एक शिक्षक का दृश्य चित्रित होता है तब शिक्षक की क्या अभिधारणा होती है क्या हम शिक्षक को पाठ्यचर्या एवं पुस्तक से बढ़ा कक्षीय ज्ञान प्रदाता के रूप में देखते है । शिक्षक-अभिभावक संबंध के संदर्भ में प्रस्तुत कोलमैन रिपोर्ट में वर्णित है कि- जब भी विद्यालय ने बच्चों को घर में अपने अभिभावक के साथ पढ़ने के लिए प्रेरित किया, उन बच्चों के मुकाबले अधिक फायदा हुआ है जो सिर्फ विद्यालयों में ही शिक्षा प्राप्त करते है । यूनेस्को ने अपने दस्तावेज में शिक्षक अभिभावक संबंध के महत्त्व को बतलाया कि- बच्चों की भाषा विकास में उसके परिवार का महत्वपूर्ण योगदान होता है । प्राथमिक विद्यालय रायपुर के अवलोकन के पश्चात् वर्णित किया गया है कि विद्यालय में नियमित (दो माह के अन्तराल पर) शिक्षक अभिभावक सम्पर्क कार्यक्रम आयोजित किया जाता है । जिसमे अभिभावकों को भाच्चों के शैक्षिक बाधक तत्वों की पहचान कर दूर करने का प्रयास किया जाता है एवं बच्चों के पालन पोषण के मुद्दों पर चर्चा की जाती है साथ ही अभिभावकों की मदत से कैसे बच्चों में पढ़ने की संस्कृति विकसित की जा सकती है । बच्चों के कक्षा ज्ञान को अभिभावकों को मद्त से वास्तविक जीवन से जोड़ा एवं उपयोग किया जा सकेगा । अन्त में कहा जायेगा कि एक बच्चें के जीवन में दो महत्वपूर्ण स्तम्भ शिक्षक एवं अभिभावक होते है जिनके मध्य सकारात्मक सम्बन्ध का होना अति आवश्यक होता है ।


भूमिका : 

राष्ट्रिय पाठ्यचर्या की रूपरेख 2005 में कहा गया है कि “उर्वर एवं सुदृढ़ शिक्षा का सृजन सदैव बच्चें की भौतिक व सांस्कृतिक मिट्टी में होता है, उसी में उस की जड़े जमी होती है तथा उसका पोषण माता-पिता, शिक्षकों, सहपाठियों व समुदाय के साथ अन्तःक्रिया के माध्यम से होता है ।” अभिभावक, परिवार प्रणाली के महत्वपूर्ण घटक हैं । वे अपने बच्चों  के वयस्क होने तक उनकी देखरेख की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हैं। परिवार बच्चों को सामाजिक बनाने की प्रक्रिया बड़े हद तक पूरी करता है और उसके मानसिक विकास को भी प्रभावित करता है । बच्चे की देखभाल दुनिया भर में की जाती है। इस नजरिये का समर्थन विभिन्न मानवशास्त्रीय अध्ययनों और शोधों में भी किया गया है। परिवार के सदस्यों के लिंग के आधार पर उनकी भूमिका निर्धारित करने का काम परिवार करता है। वह उनके आपसी व्यवहार, अन्तरसंबंध, समुचित सामाजिक रवैये आदि को भी स्थापित करता है। परिवार सन्दर्भों का एक ऐसा आधारभूत ढांचा तैयार करता है, जिसकी मदद से बच्चा बड़े समाज को देखता-समझता है ।

बच्चा एक तरफ स्कूल में औपचारिक शिक्षा पाता है और दूसरी ओर अपने घर में एक अलग तरह की और अक्सर अपेक्षाकृत गहरी शिक्षा उसके माँ-बाप और उसका माहौल देते है बच्चों का शिक्षकों से असंवाद की स्थिति बचपन से ही बच्चों के मन में जाने अनजाने एक द्वन्द पैदा हो जाता है जो अक्सर पूरी जिंदगी किसी न किसी रूप में उनके साथ रहता है इस संवादहीनता या अपर्याप्त संवाद के कई कारण है इनके कुछ तो व्यवहारिक संगठनात्मक कारण है और कुछ स्पष्ट रूप से उन संस्कारों का हिस्सा है, जिन्हें देख समझ कर, प्रयास करके, बातचीत करके एक ओर हटाया जा सकता है व्यवहारिक कारणों में एक है। मुख्यधारा के स्कूलों में छात्रों की भीड़ । इस असंवाद की स्थिति को अभिभावक-शिक्षक संबंध के माध्यम से दूर किया जा सकेगा|

शिक्षक की अवधारणा : 

प्रश्न उठता है कि शिक्षक का वर्णन आते समय हमारे मन में शिक्षक की क्या अवधारणा होती है?

(क) क्या वह नियम (मैनुअल) पुस्तक से बंधा, अंतरतम तक आदेशपालक, आज्ञाकारी ऐसा व्यक्ति है, जिसे कोई स्वतंत्रता नहीं है और जो केवल सौंपे गए काम कर देने में समर्थ है?

(ख) क्या वह ऐसा व्यक्ति है, जिसे पाठशाला या शिक्षा के नियोजन के मामले में कोई स्वतंत्रता नहीं है, लेकिन उसके पास जो करने को कहा जाए उसे क्रियान्वित कर पाने लायक पर्याप्त ज्ञान और कौशल का आधार है?

(ग) क्या वह शैक्षणिक विचार, विषयवस्तु और अर्थपूर्ण शिक्षा को स्वतंत्र रूप से निभाने के व्यावहारिक कौशलों के स्तर पर पर्याप्त रूप से तैयार शिक्षा का दृष्टा है?

(घ) क्या वह एक (शेफलर के मुहावरे का इस्तेमाल करते हुए) छोटा-मोटा मिस्त्रीहै जो जैसा उसे कहा जाए वैसा पढ़ा सकेगा या बच्चों को जानने, करने और अनुभूति के मानवीय तरीकों में दीक्षित-प्रविष्ट करवाने के लिए उनके साथ एक तार्किक विमर्श शुरू करने में समर्थ कोई व्यक्ति है? दूसरे शब्दों में कहें तो वह किसी दूसरे के अभिकल्पित शैक्षणिक भवन में ईंटें चिनने वाला कारीगर है या इस भवन की रचना में सहयोगी वास्तुकार है?

मनोवैज्ञानिक एडलर ने कहा है कि शिक्षक के पास एक अक्षय खजाना है । यह कितना सच है, मैं सोचता हूं। बहुत से शिक्षक यह नहीं जानते, उनके पास कितनी शक्ति हैं, उनके पास कितना खजाना है? अपनी उस शक्ति को पहचानिए, अपने उस खजाने का उपयोग कीजिए। मैं आपको फिर पूछना चाहता हूं कि कोरी शिकायत करके ही आप रह जाना चाहते हैं, या अपनी शिकायत को दूर करने के लिए आप कुछ निर्माण भी करना चाहते हैं? यदि आप भी सर्वसाधारण की तरह केवल शिकायत कर रह जाना चाहते हैं और अपना कैरियरभर बनाना चाहते हैं, तो फिर शिकायत मत कीजिए ।

अध्यापक की अक्सर भावविभोर होकर याद और महिमामंडित की जाने वाली छवि उस लगभग सर्वज्ञ गुरुकी है जिसका ध्येय सदा अपने शिष्य का कल्याण होता था (और वह हमेशा पुरुष ही होता था)। अपने क्षेत्र का ज्ञाता और विद्या के कोष का यह समर्पित संरक्षक विद्या प्रदान करने में भारी कृपणता बरतता था। कड़ी कसौटी पर कसकर सुपात्र शिष्योंको चुनते हुए उसे शिक्षा के सार्वभौमीकरण के विचार की भनक तक नहीं थी। लेकिन यह छवि शायद मिथक ही है और ऐतिहासिकता की कसौटी पर खरी न उतरे। औपनिवेशिक युग में अध्यापक नियमों, पाठ्यक्रमों, पाठ्यपुस्तकों, परीक्षाओं और ऊपर से आए आदेशों से पूरी तरह बंधा, व्यवस्था का एक नौकर भर रह गया है। अपनी स्वायत्तता खोकर वह वरीयताक्रम के सबसे निचले पायदान पर खड़ा सरकारी नौकर भर है ।

शिक्षक-अभिभावक संबंध के मायने : 

अभिभावको की भागीदारी और विद्यार्थी की सफलता के बीच सकारात्मक संबंध होता है। अपने बच्चों की शिक्षा में अभिभावकों या परिवार की हिस्सेदारी किसी भी अन्य सुधार कार्यक्रम की अपेक्षा कहीं ज्यादा असरदार होती है। शिक्षकों को अभिभावक-अध्यापक साझेदारी का महत्व समझते हुए । अभिभावको को उनके बच्चो की शिक्षा में भागीदार बनाना चाहिए। शिक्षक के तौर पर आपको यह जानना चाहिए कि अभिभावको का सहयोग आप कैसे प्राप्त कर सकते हैं। भारत में सर्वशिक्षा अभियान जैसे सरकारी कार्यक्रम के तहत विद्यालय के प्रबंधन के लिए ग्राम शिक्षा समिति तथा अभिभावक-अध्यापक संघ जैसे ढांचो को लगाया गया । गांव के सभी वर्गो के प्रतिनिधियों को साथ लेकर ये संस्थाएं प्राथमिक विद्यालयों के कामकाज और उनकी सुविधाओ की देखरेख करती हैं । इस तरह वे विभिन्न वर्गो से आनेवाले सामाजिक या शारीरिक तौर पर वंचित बच्चों की शिक्षा संबंधी जरूरतो को लेकर जागरूकता पैदा करने के काम में स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित कर पाती हैं। ऐसे बच्चों के माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई में दिलचस्पी लेने के लिए प्रेरित होते हैं और विद्यालय की शैक्षणिक प्रक्रिया में सांस्कृतिक तथा पारंपरिक तौर पर अपना योगदान दे पाते हैं। शाह, नरेश लाल. (2013). ने अपने लेख ‘समुदाय को सरकारी शिक्षा पर भरोसा है’ में शिक्षक अभिभावक सम्बन्ध के सन्दर्भ में बतलाते है कि- शिक्षकों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किस तरह से बच्चों के अभिभावक बच्चों को घर पर उनकी सहायता करे । समय पर उनको कापियाँ, पेन्सिल दे और बच्चों को पढ़ने के लिए घर पर प्रेरित करे । इस हेतु इन्होने बतलाया कि राजकीय प्राथमिक विद्यालय मथोली चिन्याली सौडं की विद्यालय प्रबन्ध समिति एवं अभिभावकों के मध्य संवाद कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया । जिसमे अधिकांशतः अभिभावक ग्रामीण पृष्ठभूमि से सम्बन्ध रखते है । इनको बतलाया गया कि बालकों को घर पर उचित देखभाल के माध्यम से शिक्षा का उपयुक्त वातावरण बनाया जा सकेगा । कभी कभी विद्यालय ही अभिभावकों से संवाद हेतु गाँवों में चला जाता है । जिसका फायदा यह हुआ कि जो अभिभावक विद्यालय नहीं आ पाते है उनसे भी शिक्षक संपर्क स्थापित कर पाते है और बच्चों की शिक्षा से जुड़े मुद्दों को बच्चों के परिवार के साथ चर्चा करते है ।

विद्यालयी शिक्षा में अभिभावको की भागीदारी के मामले में कोलमैन[1] रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण कदम था। इस रिपोर्ट में पहली बार स्वीकार किया गया कि बच्चो की शिक्षा तथा उनकी उपलब्धियों में परिवार का सबसे अहम स्थान है। यह रिपोर्ट 1960 के दशक में आई थी। तब से लेकर आज तक इस बारे में जितने भी अध्ययन हुए, उन सबमें कुछ ऐसा ही परिणाम सामने आया है। इससे पहले यही माना जाता रहा था कि विभिन्न विद्यालयों में बच्चों की उपलब्धियो के उच्च मानक विद्यालय के संसाधनों, अध्यापकों तथा अन्य कारको के परिणामस्वरूप है। कोलमैन रिपोर्ट अमेरिका के 1900 प्राथमिक विद्यालयो में कराए गए सर्वेक्षण पर आधारित था। इस अध्ययन में यह भी बताया गया था कि परिवारो की श्रेणी तथा उनकी सामाजिक- आर्थिक स्थिति से परे, जब कभी विद्यालयो ने बच्चों को घर में अपने मां-बाप के साथ पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया, उन्हें ऐसे बच्चों के मुकाबले कहीं ज्यादा फायदा हुआ जो सिर्फ विद्यालयो में अपने अध्यापकों के साथ पढ़ते थे। यह भी देखा गया कि बच्चे के विद्यालयों में दाखिला लेने के पहले ही उसकी जातीय तथा सामाजिक श्रेणी की उपलब्धियो का असर उस पर हावी हो चुका होता है। इस दरम्यान उसकी शैक्षणिक प्रवीणता घटित हो चुकी होती है। इस परिवर्तन के पीछे जो कारण सुझाए गए हैं, उनमें एक यह है कि परिवार जन कहीं ज्यादा समय तक बच्चे को पढ़कर सुनाते रहते हैं। अल्प आय परिवारों में बच्चे को औसतन 25 घंटे पढ़कर सुनाया जाता है, जबकि मध्यम आय वाले परिवारों में यह औसत 1700 घंटे का देखा गया है।

शिक्षकों-अभिभावको की भा्गीदारी और बच्चे की उपलब्धियो में सकारात्मक संबंध की पुष्टि के लिए पर्याप्त साक्ष्य हैं-

1. माता-पिता द्वारा बच्चों को कहानियों की किताबें पढ़कर सुनाने से बच्चों की भाषा परिष्कृत होती है और उनमें पुस्तक प्रेम जागता है।

2. माता-पिता द्वारा बच्चों को ज्यादा से ज्यादा कहानियां सुनाने से उनकी साक्षरता योग्यता में वृद्धि होती है ।

3. माता-पिता द्वारा बच्चों के साथ बिताई गई अवधि का सीधा असर बच्चे के विकास और विद्यालय की उपलब्धियों पर पड़ता है ।

यूनेस्को की अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षा ब्यूरो के अनुसार: यूनेस्कों (1990) ने अपने दस्तावेज में शिक्षक- अभिभावक संबंध के महत्त्व को बतलाया, जो निम्नलिखित है-        

1. परिवार की जीवन शैली यदि जानी-पहचानी होती वह बच्चे को विद्यालय में ज्यादा और बेहतर सीखने लायक बनाती है ।

2. अभिभावक और बच्चे के बीच का संबंध यदि भाषा की दृष्टि से समृद्ध और भावात्मक समर्थन देने वाला होती इससे बच्चे का लाभ होता है ।

3. यदि माता-पिता अपने बच्चे को सुरक्षित जीवन देते हैं, उन्हें समय का सही उपयोग करने के लिए प्रेरित करते हैं और साथ-साथ पारिवारिक जीवन के सामान्य अंग के तौर पर उनके साथ अनुभव बांटते हैं तो इससे बच्चे विद्यालय में बेहतर प्रदर्शन कर पाते हैं ।

4. माता-पिता यदि अपने बच्चों के सामने मानक स्थापित करते हैं तो बच्चे उन मानकों को गंभीरता से ग्रहण करते हैं ।

5. बच्चे अपने माता-पिता और शिक्षकों के बीच होने वाली दो-तरफा बातचीत से भी लाभान्वित होते हैं ।

6. विद्यालय से अभिभावकों के संबंध का मतलब है कि उनका संबंध अपने बच्चे से तो बना रहता ही है, शैक्षणिक संस्थान के अलावा वह दूसरे बच्चों के अभिभावकों के साथ भी बना रहता है ।

7. घर के माहौल को बेहतर बनाने के लिए माता-पिता को कई तरह से प्रशिक्षित किया जा सकता है और अक्सर इसके सकारात्मक परिणाम निकलते हैं ।

8. विद्यालय को चाहिए कि- बच्चे के साथ परिवार को जोड़ने के मामलों में वह हरेक परिवार के साथ अलग-अलग तरह की रणनीति अपनाए, क्योकि विद्यालय के साथ सभी परिवारों के संबंध अलग-अलग तरह के ही होते हैं ।

हाल के वर्षों में, विद्यालय में अभिभावकों की भागीदारी को एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक रणनिति के तौर पर देखा जाने लगा है। प्रत्येक विद्यालय को चाहिए कि वह ऐसी साझेदारी को बढ़ावा दे जो अभिभावकों की भागीदारी को बढ़ाने के साथ ही बच्चे के सामाजिक, मानसिक और शैक्षणिक विकास में सहयोगी हो। शैक्षणिक सुधारों के इस दौर में अनेक शोध अध्ययनों और वर्षों के अनुभवों से जो एक बात छनकर आई है, वह है - अभिभावकों तथा परिवार की भागीदारी से विद्यार्थी की उपलब्धि और उसकी सफलता बढ़ती हैं । पालीवाल, रश्मि. (2010). शिक्षक अभिभावक सम्बन्ध के महत्त्व के सन्दर्भ में बतलाती है, कि बच्चों की शिक्षा में प्रगति हेतु बच्चों को प्रोत्साहन अति आवश्यक है, बच्चों की कमजोरिया क्या है यह अभिभावक से सम्पर्क साधकर ज्ञात किया जा सकता है । साथ ही अगर किसी बच्चें के अभिभावक अशिक्षित होते है । तब इसका असर बच्चें की शिक्षा पर भी पड़ता है किन्तु इस असर को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है । जिसका एक बेहतरिन माध्यम है शिक्षक एवं अभिभावक का समय-समय पर आपसी सम्पर्क बनाये रखना अति आवश्यक है ।

एक शोध के दौरान प्राथमिक विद्यालय रायपुर, गाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश का अवलोकन करने का अवसर प्राप्त हुआ । जहाँ शिक्षकों से विचार विमर्श करने का सुअवसर प्राप्त हुआ । वहाँ यह जानकर अच्छा लगा की विद्यालय के द्वारा किये जाने वाले कार्य समुदाय एवं अभिभावकों की भागीदारी के बीना नहीं किये जाते है । जैसा कि प्राथमिक विद्यालय रायपुर के शिक्षक बतलाते है कि हमारे विद्यालय में समय-समय पर अभिभावकों से संपर्क स्थापित किया जाता है, एवं बच्चों की शिक्षा में बाधक तत्वों की पहचान कर दूर करने के उपायों पर अभिभावकों से चर्चा की जाती है जिससे बच्चों की शिक्षा एक निरंतर प्रवाह के साथ बढती रहे शिक्षक बतलाते है कि विद्यालय में प्रत्येक दो महीने में एक बार शिक्षक-अभिभावक सम्पर्क कार्यक्रम आयोजित किया जाता है ।  कार्यक्रम में निम्नलिखित कार्य किये जाते है-

1.       बच्चों की शैक्षिक प्रगति, कमजोरियों एवं शिक्षा में बाधक तत्वों (आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षिक) और दूर करने के उपायों के सम्बन्ध में अभिभावकों से परिचर्चा की जाती है । जो अभिभावक आर्थिक रूप से कमजोर है उनके बच्चों को विभिन्न माध्यमों से सहायता प्रदान की जाती है, साथ ही उन अभिभावकों से चर्चा भी की जाती जो सामाजिक रूप से पिछड़े समाज से सम्बंधित है । उनको समझाया जाता है कि बच्चों का श्रम कम से कम मात्रा में घर के कार्यों में इस्तेमाल किया जायें| क्योकि सामाजिक रूप से पिछड़े समाज के लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने कारण परिवार के सभी सदस्य मिलकर आर्थिकोपार्जन करते है । इस कारण बच्चों को घर पर पढ़ने के उपयुक्त समय एवं साधन नहीं मिल पाता । यह समस्या शिक्षक अभिभावक संबंध के माध्यम से दूर किया जा सकता है ।

2.       बच्चों के पालन पोषण से सम्बंधित मुद्दों पर अभिभावकों से चर्चा की जाती है जैसे- बच्चों को नकारात्मक वातावरण से बचाया जाय बच्चों को खेलने के उचित अवसर भी प्रदान किये जाए, क्योकि बच्चों को स्वतन्त्रता से दूर रखा जाता है । तब उनमे कुंठा की भावना से ग्रसित हो जाते है, और इस प्रकार के बच्चें परिवार से दूर हो जाते है एवं समाज के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकते है ।

3.       कक्षा ज्ञान एव वास्तविक जीवन आधारित ज्ञान के सन्दर्भ में अभिभावकों से चर्चा की जाती है कि अभिभावकों के छोटे-छोटें प्रयास के माध्यम से कक्षा ज्ञान को जीवन से जोड़ा जा सकेगा, जैसे- घर पर नाप तौल एवं वजन करने की प्रक्रिया को गणित की कक्षा से जोड़ने से बच्चों को गणित सरल तरीके से समझ में आ जाएगी । इन प्रक्रियों में अभिभावक की भूमिका महत्त्व पूर्ण होती है, क्योकि अभिभावक बच्चों को नाप तौल एवं वजन करने की प्रक्रिया की जानकारी कराकर शिक्षकों की मद्दत करते है । कक्षा ज्ञान को वास्तविक जीवन से नहीं जोड़ा गया तो बच्चों के मन में कक्षा ज्ञान के प्रति भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है ।   

4.       अभिभावकों की मद्त से बच्चों में पढ़ने की संस्कृति विकसित करने का प्रयास किया जाता है । अभिभावकों को समझाया जाता है कि पढ़ने की संस्कृति के विकास में आप का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है । आप अपने बच्चों को पढ़ने के लिए रोचक पुस्तकें, पत्रिकाए आदि उपलब्ध कराये साथ ही घर के पढ़े-लिखे लोग बच्चों के साथ पुस्तके लेकर बैठ जाये, जिससे बच्चों में भी पुस्तके पढ़ने की आदत विकसित होगी ।

शिक्षक एक बच्चे की तरफ इशारा करते हुए बतलाते है कि शुभम जब सात वर्ष का था तो उसके पिता स्कूल में दाखिला कराने लाये थे और शुभम के पिता बतलाया था कि शुभम को पाँच वर्ष की उम्र में एक इंग्लिश मीडियम स्कूल में दाखिला करा दिया । दो वर्ष तक वह उस स्कूल में शिक्षा प्राप्त किया किन्तु शुभम की शिक्षा में कोई प्रगति नहीं हुई, क्योकि शुभम की मानसिक स्थिति सामान्य बच्चों के सामान नहीं है । शुभम के सिखाने की गति सामान्य बच्चों से धीमी है, किन्तु इस प्रकार के बच्चों को सामान्य कक्षा में सिखाया जा सकता है । आज शुभम कक्षा चौथी में पढाई कर रहा वो भी सामान्य बच्चों के साथ, ऐसा संभव हुआ उसके अभिभावकों एवं हम शिक्षकों के मिला जुला प्रयास से । हम शिक्षकों ने शुभम के अभिभावकों को समझाया कि- शुभम की थोडा अतिरिक्त देखाभालकर शुभम की शैक्षिक स्थिति को सुधारा जा सकता है । आप घर पर अतिरिक्त समय में शुभम को अध्यापन कार्य कराये जिससे शुभम की शैक्षिक स्थिति में सुधार लाया जा सकेगा । पाण्डे, लता. (2010). शिक्षक अभिभावक संबंध के संदर्भ में बतलाती है कि पहली कक्षा के शिक्षकों के लिए बहुत जरुरी है। कि बच्चों के अभिभावकों से उनका संवाद लगातार बना रहे क्योकि गृह शिक्षक के रूप में अभिभावकों की भूमिका को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। बच्चों के सम्बन्ध में शिक्षक और गृह शिक्षक यानि अभिभावक दोनों सजग रहे और दोनों का ही पर्याप्त स्नेह और उचित मार्गदर्शन बच्चें को मिले तब पहली कक्षा के बच्चों के लिए विद्यालयी जीवन सुखद अहसास बन सकता है ।

निष्कर्ष : 

निष्कर्षतः कहा जायेगा कि- किसी बच्चें के जीवन में उसके अभिभावक, शिक्षक, परिवार एवं आस-पास के समाज का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है । अभिभावक एवं शिक्षक ही वह कड़ी है जिनके सानिध्य में बच्चा सबसे अधिक समय व्यतीत करता है । किसी भी बच्चें की माता उसकी प्रथम शिक्षिका होती है । अभिभावक एवं शिक्षक के सानिध्य में ही बच्चा सामाजिकरण की प्रक्रिया सिखाता है । किसी भी बच्चें के भाषा विकास में परिवार की अतिमहत्वपूर्ण भूमिका होती है, खासकर बच्चें के शुरूआती जीवन के वर्षो तक । बच्चों की शिक्षा में अभिभावक एवं शिक्षक महत्वपूर्ण स्तम्भ होते है, अगर ये दोनों महत्वपूर्ण स्तम्भ आपस में नहीं जुड़ पायेगे तो बच्चों का शैक्षिक विकास सुचारू रूप से नहीं हो पायेगा । अभिभावकों की विद्यालयी शिक्षा में भागीदारी बढाने में अभिभावक संपर्क कार्यक्रम एवं ग्राम शिक्षा समिति की महत्वपूर्ण भूमिका होगी । जैसा कि राष्ट्रिय पाठ्यचर्या की रुपरेखा 2005 में बतलाया गया है कि- ‘सभी स्कूलों को इस प्रकार के तरीके खोजने की आवश्यकता है जिससे विद्यालय में अभिभावकों की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी बढ़ सके

सन्दर्भ ग्रंथ :

·         एन.सी.ई.आर.टी. (2005). राष्ट्रीय पाठयचर्या की रूपरेखा 2005, नई दिल्ली, प्रकाशन विभाग, एन.सी.ई.आर.टी,

·         यूनेस्को. (1990). रीडिंग सैम : पैरेन्ट्स एंड लर्निंग, यूनेस्को : इन्टर नेशनल एकेडमी ऑफ़ एजुकेशन, पेरिस, इंटरनेशनल ब्यूरो ऑफ़ एजुकेशन.

·         लर्निंग कर्व : 2018 : शिक्षक, बेंगलुरु, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन, अंक-14.

·         पाण्डे, लता. (2010). पहली कक्षा का शिक्षक, नई दिल्ली, प्राथमिक शिक्षक, अंक-3-4, वर्ष-34 .

·         पालीवाल, रश्मि. (2010). राह बनाते शिक्षक, नई दिल्ली, प्राथमिक शिक्षक, अंक-3-4, वर्ष-34 .

·         शाह, नरेश लाल. (2013). समुदाय को सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा है, प्रवाह उत्तरकाशी स्कूल विशेषांक-2, देहरादून, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन.



[1] प्राप्ति श्रोत : www.slideshare.net/NBASD/parent-involvement-presentation.