बच्चों के लिए बोझ न हो गृह कार्य

शिक्षा त्रिध्रुवीय प्रक्रिया हैं,जिसके तीन आयाम होते है पहला शिक्षक, दूसरा विद्यार्थी एवं तीसरा पाठ्यचर्या। इन तीनों आयाम को मिलाकर शिक्षा त्रिध्रुवीय प्रक्रिया बन जाती है। यह त्रिध्रुवीय प्रक्रिया शिक्षा के औपचारिक रूप में होती है। गृहकार्य शिक्षा का अभिन्न अंग है, मैं गृहकार्य बच्चों को देने के पक्ष में हूं, जिसका कारण है गृहकार्य के सकारात्मक पहलू, जैसे- 1. शिक्षण के उपरान्त विषय वस्तु की पुनरावृत्ति गृहकार्य के माध्यम से हो जाती है। 2. शिक्षण की प्रभावशीलता गृहकार्य के माध्यम से ज्ञात की जाती हैं। 3. सतत-व्यापक मूल्यांकन तकनीक का उपयोग कर शिक्षक शिक्षण का मूल्यांकन गृहकार्य के माध्यम से करता है, जैसे-शिक्षण उपरान्त शिक्षक विद्यार्थियों को गृहकार्य प्रदान करता है फिर उसका मूल्यांकन करता है और देखता है कि विद्यार्थी कितनी विषयवस्तु को सीखे हैं? मैं गृहकार्य देने के पक्ष में हूं किन्तु इसका जो स्वरूप वर्तमान में शिक्षको द्वारा प्रयोग किया जाता है, उससे मैं कदापि सहमत नहीं हूं। बच्चों में रुचि, शारीरिक क्षमता, भाषिक क्षमता, अमूर्तन और सामान्यीकरण की क्षमता का विकास स्कूल-पूर्व शिक्षा से लेकर माध्यमिक स्तर की शिक्षा तक में होता है। यह समय गहन वृद्धि एवं विकास का, रुचियों एवं क्षमताओं में मूलभूत बदलाव का होता है। इसलिए ज्ञान के सृजन एवं पुनः सृजन के लिए अनुभव के आधार, भाषायी क्षमताओं एवं प्राकृतिक संसार और दूसरे लोगों के साथ अंतःक्रिया की ज़रूरत होती है। स्कूल में पहली बार प्रवेश करते समय बच्चा संसार के ज्ञान का सृजन शुरु कर चुका होता है। हर चीज जो बच्चे बाद में सीखते हैं वह उस ज्ञान से संबंधित होता है जो वह स्कूल मंे लेकर आते हैं। स्कूल अवसर देता है कि इसी ज्ञान को आधार मान कर, सचेत रह कर और जुड़ाव के साथ आगे बढ़ा जाए। जान होल्ट ;बचपन से पलायनद्ध कहते हैं कि बच्चों का चारदीवारी में कैद करके नहीं रखा जा सकता है। ज्यादातर वयस्क यही सोचते हैं, जैसा उनका जीवन है वैसे ही बच्चे भी जीवन व्यतीत करें। जैसे कि (घर्घानी ;2012). ने अपने शोध में बतलाया कि गृहकार्य का बच्चों की शिक्षा पर सकारात्मक परिणाम होता है और बच्चों की शैक्षिक प्रगति में सहायक होता है। इन्होनें बतलाया कि गृहकार्य का रूप सृजनात्मक होना चाहिए। जो कि वर्तमान में केवल पुनरावृत्ति एवं रटन आधारित रह गया है। हमारी शिक्षा प्रणाली नंबरों के दौड़ के रूप में विकसित हो चुकी हैं। इस स्थिति की जिम्मेदारी के रूप में हमारा सामाजिक दृष्टिकोण-जो बच्चा ज्यादा अच्छे अंक प्राप्त करता है, वह बहुत होशियार समझा जाता हैं। इस स्थिति की जिम्मेदार शिक्षा का निजीकरण खासकर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों का प्रचलन। अंग्रेजी माध्यम के अधिकाश शिक्षक केवल ज्यादा से ज्यादा गृहकार्य देने के पक्ष में होते हैं, क्यांेकि इनका मानना होता है कि जितना बच्चों को व्यस्त रखा जाए, वे अच्छे ढंग से पढ़ाई करेंगे। यशपाल समिति ;(1992-93) की रिपोर्ट ‘शिक्षा बिना बोझ के’ में बतलाया गया हैं कि गृहकार्य की प्रकृति में परिवर्तन की आवश्यकता है। प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों को कोई गृहकार्य न दिए जाए। उच्च प्राथमिक तथा माध्यमिक कक्षाओं में जहां आवश्यक हो वहां पाठ्य पुस्तकों से हटकर गृहकार्य दिया जाए, जो उनके दैनिक जीवनचर्या से जुड़ा हो।

हम अपनी बात को पाउलो फ्रेयर की कही हुई उक्ति से प्रारंम्भ करते है जिन्होनें शिक्षा के महत्व के सम्बंध कहा हैं कि- ’’शिक्षा के मुक्तिदाई होने के लिए यह जरूरी है कि सीखनेवाले उसमें सक्रिय भागीदार हों न कि उसके निष्क्रिय लक्ष्य, जैसा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में होता है।’’ 

शिक्षा त्रिध्रुविय प्रक्रिया हैं जिसके तीन आयाम होते है पहला शिक्षक, दुसरा विद्यार्थि एवं तिसरा पाठ्यचर्या। इन तीनों आयाम को मिलाकर शिक्षा त्रिध्रुविय प्रक्रिया बन जाती है। यह त्रिध्रुविय प्रक्रिया शिक्षा के औपचारिक रूप में होती हैं। गृहकार्य शिक्षा का अभिन्न अंग हैं, मैं गृहकार्य बच्चों को देने के पक्ष में हूॅ, जिसका कारण है गृहकार्य के सकारात्मक पहलू, जैसे- 1. शिक्षण के उपरान्त विषय वस्तु की पुनरपवृत्ति गृहकार्य के माध्यम से हो जाती हैं। 2. शिक्षण की प्रभावशिलता गृहकार्य के माध्यम से ज्ञात की जाती हैं। 3. सतत व्यापक मूल्यांकन तकनीकि का उपयोग कर शिक्षक शिक्षण का मूल्यांकन गृहकार्य के माध्यम से करता हैं, जैसे- शिक्षण उपरान्त शिक्षक विद्यार्थियों को गृहकार्य प्रदान करता हैं फिर उसका मूल्यांकन करता हैं और देखता है कि विद्यार्थि कितना विषय वस्तु को सीखे हैं। 

मैं गृहकार्य देने के पक्ष में हूॅ किन्तु इसका जो स्वरूप वर्तमान में शिक्षको द्वारा प्रयोग किया जाता हैं उससे मै कदापि सहमत नहीं हूॅ। बच्चों मे रुचि, शारीरिक क्षमता, भाषिक क्षमता, अमूर्तन और सामान्यीकरण की क्षमता का विकास स्कूल-पूर्व शिक्षा से लेकर माध्यमिक स्तर की शिक्षा तक में होता है। यह समय गहन वृद्धि एवं विकास का, रुचियों एवं क्षमताओं में मूलभूत बदलाव का होता है। इसलिए ज्ञान के सृजन एवं पुनः सृजन के लिए अनुभव के आधार, भाषायी क्षमताओं एवं प्राकृतिक संसार और दूसरे लोगों के साथ अंतःक्रिया की ज़रूरत होती है। स्कूल में पहली बार प्रवेश करते समय बच्चा संसार के ज्ञान का सृजन शुरू कर चुका होता है। हर चीज जो बच्चे बाद में सीखते हंै वह उस ज्ञान से संबंधित होता है जो वह स्कूल मंे लेकर आते हंै। स्कूल अवसर देता है कि इसी ज्ञान को आधार मान कर, सचेत रह कर और जुड़ाव के साथ आगे बढ़ा जाए। जान होल्ट (बचपन से पलायन) कहते हैं कि बच्चो का चारदीवारी में कैद करके नहीं रखा जा सकता हैं, ज्यादा तर व्यस्क यही सोचते हैं जैसा उनका जीवन है वैसे ही बच्चें भी जीवन व्यतित करें। जैसे कि घर्घानी (2012). ने अपने शोध में बतलाया कि गृहकार्य का बच्चों की शिक्षा पर सकारात्मक परिणाम होता हैं, और बच्चों की शैक्षिक प्रगति में सहायक होता हैं, इन्होनें बतलाया कि गृहकार्य का रूप सृजनात्मक होना चाहिए। जो कि वर्तमान में केवल पुनरावृत्ति एवं रट्््न आधारित रह गया हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली नम्बरों के दौड़ के रूप में विकसीत हो चुॅकि हैं, इस स्थिति की जिम्मेदारी के रूप में हमारी सामाजिक दृष्टिकोण- जो बच्चा ज्यादा अच्छें अंक प्राप्त करता हैं वह बहुत होशियार समझा जाता हैं। इस स्थिति की जिम्मेदार शिक्षा का नीजिकरण खाॅसकर अंगे्रजी माध्यम के स्कूलों का प्रचलन। अंग्रेजी माध्यम के अधिकाशतः शिक्षक केवल ज्यादा से ज्यादा गृहकार्य देने के पक्ष में होते हैं क्योकि इनका मानना होता हैं कि जितना बच्चों को व्यस्त रखा जाए, वे अच्छे ढ़ग से पढ़ाई करेगे। यशपाल समिति (1992-93) की रिपोर्ट ’शिक्षा बिना बोझ के’ में बतलाया गया हैं कि गृहकार्य की प्रकृति में परिवर्तन की आवश्यकता हैं। प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों को काई गृहकार्य न दिये जाए। उच्च प्राथमिक तथा माध्यमिक कक्षाओं में जहाॅ आवश्यक हो वहाॅ पाठ्य पुस्तकों से हटकर गृहकार्य दिया जाए, जो उनके दैनिक जीवनचर्या से जुड़ा हो।

कैसा हो गृहकार्य का स्वरूप?: 

एन.सी.एफ 2005 में शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के सम्बन्ध में बतलाया गया हैं कि-  रचनात्मक परिप्रेक्ष्य में, सीखना ज्ञान के निर्माण की एक प्रक्रिया है। विद्यार्थी सक्रिय रूप से पूर्व प्रचलित विचारों में उपलब्ध सामग्री/गतिविधियों के आधार पर अपने लिए ज्ञान की रचना करते हैं। गृहकार्य के स्वरूप की बात की जाए तब इसका रूप शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर निम्नलिखित सिद्धान्तों के अनुरूप हो- 

(क). समझ के रूप में: ज्ञान के पुष्टिकरण व औचित्य को स्थापित करने की प्रक्रिया मंे जिन अवधारणाओं व अर्थों का उपयोग किया जाता है, उनके आधार पर भी ज्ञान का वर्गीकरण किया जा सकता है। प्रत्येक विद्यार्थि का अपना ‘आलोचनात्मक चिंतन’, ज्ञान को जाँचने व उसकी पुष्टि करने का तरीका और अपने प्रकार की रचनात्मकता होती है। गृहकार्य की विषय वस्तु चिंतन आधारित हो, जैसे- बच्चों को मौसम सम्बन्धित गृहकार्य प्रदान करना हो तब उन्हें कहाॅ जाए वे अपने आसपास के तापमान, आकाशिय स्थिति, हवा की गति एवं दिशा ज्ञात करके लाये।

(ख). अवलोकन आधारित: अवलोकन सरल एवं सुगम माध्यम हैं किसी वस्तु के सम्बन्ध में जानकारी के लिए। इस सिद्धान्त के अन्र्तगत गृहकार्य हेतु बच्चों से कहाॅ जाए कि वे अपने आासपास के पेड़ों को देखे उनके नामों की सूचि बनाए और उनकी विशेषता/विभिन्नता को लिखें। जानकारी प्राप्त करे चारा काटने वाली मशिन कैसे कार्य करती हैं।

(ग). कल्पना आधारित: बच्चें कल्पनाशिल होते हैं। सिंगमंड फ्रायड कहते है कि मनुष्य की दमित इच्छाएॅ चेतन अवस्था से निकलकर अचेतन अवस्था में चली जाती है। उसी प्रकार बच्चों की शिक्षा देते वक्त यह ध्यान रखा जाए कि उनकी इच्छाये चेतन अवस्था में बनी रहें। इस सिद्धान्त के अन्र्तगत गृहकार्य का स्वरूप इस प्रकार का हो कि बच्चों की कल्पना को वास्तविकता प्रदान किया जाये, जैसे- कोई बच्चा इच्छा रखता हैं वह अभियात्रिक (इंजिनियर) बनेगा और अच्छी अच्छी गाडि़या बनायेगा तब उसे गृहकार्य उसी प्रकार के प्रदान किये जाए और उसे कबाड़ से गाडि़यों के प्रतिमान बनाने को कहाॅ जाएॅ। या कल्पना करे की आप को एक दिन बिना पानी के रहना पड़े तब आप क्या करेगे उन सम्भावित मुश्किलों को लिखे जिन्हें आप सामना करेगे। 

(घ). बच्चांे का ज्ञान और स्थानीय ज्ञान आधारित: बच्चे का समुदाय और उसका स्थानीय वातावरण अधिगम प्राप्ति के लिए प्राथमिक संदर्भ होता है जिसमें ज्ञान अपना महत्व अर्जित करता है। परिवेश के साथ अंतःक्रिया करके ही बच्चा ज्ञान सृजित करता है और जीवन में सार्थकता पाता हैं। दिन प्रतिदिन बच्चे स्कूल में अपने आसपास की दुनिया के अनुभव लेकर आते हैं - वे पेड़ जिन पर वे चढ़े, फल जो उन्होंने खाए, चिडि़याँ जिन्हें उन्होंने पसंद किया। हर बच्चा बहुत ही सक्रिय होकर दिन और रात के प्राकृतिक चक्र को देखता है, मौसम, पानी, अपने आसपास के जानवरों और पौधों को भी देखता है। जब बच्चे पहली कक्षा में प्रवेश लेते हैं तो उनके पास पहले से ही समृद्ध भाषा होती है, छोटे अंकों का आधार होता है। फिर भी हम बिरले ही उनके ज्ञान को कक्षा में सुन पाते हैं। बिरले ही हम पाठ या पढ़ाने के दौरान उनसे स्कूल के बाहर की दुनिया के बारे में बात करते हैं। जैसे- शिक्षक वृत्त विषय वस्तु का कक्षा में शिक्षण करता हैं तब गृहकार्य इस प्रकार के प्रदान किये जा सकते है कि बच्चें साइकिल के पहिये का अवलोकन करें और वह कैसे कार्य करता हैं लिखे, उसमें त्रिज्या क्या है, व्यास क्या है, केन्द्र बिन्दू कहाॅ हैं इत्यादि।
(ड़). स्कूली ज्ञान और समुदाय आधारित: भारत में ऐसे भी कई समुदाय और व्यक्ति हैं जो भारत के पर्यावरण के विविध रूपों की सूचनाओं और उनके प्रबंधन संबंधी ज्ञान के भंडार हैं, जो उन्होंने पींिढ़यों से परंपरागत ज्ञान के रूप में पाने के साथ अपने व्यावहारिक अनुभव से भी प्राप्त किया है। इस प्रकार के ज्ञान में: पौधों का नामकरण और वर्गीकरण, जल-संरक्षण और जल संचय के उपाय या टिकाऊ कृषि की प्रथा शामिल है। कभी-कभी ये उससे भिन्न भी हो सकते हैं जैसा स्कूल में विषय ज्ञान देते समय बताया जाता है। कभी तो इसकी पहचान भी नहीं हो पाती है कि यह ज्ञान महत्वपूर्ण है। इन स्थितियों में, स्कूल में शिक्षकों को विद्यार्थियों को स्थानीय परंपराओं, और लोगों के पर्यावरण संबंधी व्यावहारिक ज्ञान पर आधारित परियोजना तैयार करने में मदद करनी चाहिए। जैसे-बच्चे कक्षा में जोड़ घटाव की प्रक्रिया सिखते हैं उनको जोड़ घटाव की प्रक्रिया के अन्र्तगत समुदाय या उनके वास्तविक जीवन से जुड़े उदाहरणों के द्वारा सिखाया जाए और गृहकार्य भी उसी रूप में प्रदान किया जाए।
(च) ज्ञान को फिर से रचना आधारित: ज्ञान के इस दृश्टिकोण के मुताबिक हमें खत्म हो जाने वाले तथ्यों से हटकर उस प्रक्रिया को समझने की आवश्यकता है जिनके माध्यम से वे उभर कर आते हैं। तथ्यों की सतह से नीचे जाकर भी उनके बीच गहरे संबंधों को समझने की ज़रूरत होती है जो उन्हें अर्थ और महत्त्व प्रदान करते हैं। समय के साथ ज्ञान के रूप मे परिवर्तन आवश्यक हैं। क्योकि समय के साथ ज्ञान की उपयोगिता एवं अभिधारणा में परिवर्तन आवश्यक हो जाता हैं। इस सिद्धान्त के अन्र्तगत गृहकार्य इस प्रकार के प्रदान किये जाए जो बच्चों को उनके ज्ञान में परिवर्तन एवं परिमार्जन लावें। जैसे- पालतु जानवरो की क्या उपयोगिता हैं, उनसे क्या-क्या लाभ प्राप्त होते हैं लिखे।

(छ). प्रोजेक्ट आधारित: करके सिखना सिखने की उत्तम विधि होती है इस विधि द्वारा प्राप्त ज्ञान दीर्घकालिन एवं स्थायी होता हैं। प्रोजेक्ट विधि के रचनाकार जान डिवी हैं इन्होने इसे वैज्ञानिक विधि का नाम दिया। प्रोजेक्ट प्रणाली द्वारा शिक्षा सहेतुक बन सकती है, ज्ञान का अर्जन सक्रिय रूप से होता है तथा छात्र सक्रीय रूप से ज्ञानार्जन करने वाले होते हैं, इससे कक्षा का वातावरण अधिक सक्रिय, स्वाभाविक, रूचिकर, उत्तरदायित्वपूर्ण एवं लोकतांत्रिक हो जाता हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार गृहकार्य ऐसे प्रदान किया जाए कि बच्चे किसी विन्दू पर अध्ययन करे एवं विस्तृत रिपोर्ट बनाकर लावें।

(ज). शोध आधारित: किसी विषय के गहन अध्ययन के लिए अनुसंधान विधि सर्वोत्म विधि होती हैं, इस विधि के अन्तर्गत ज्ञान के गुड़ रहस्यों को जानने की प्रक्रिया की जाती हैं, बच्चे खोजी प्रकृति के होते हैं, बच्चों के अन्दर नवीन तथ्यों, प्रवृतियों एवं वस्तुओं को जानने की जिज्ञासा उच्चत्म होती हैं, बच्चे सर्वदा नवीन वस्तुओं के प्रति आकर्षित होते हैं। शिक्षक को सर्वदा ध्यान रखना है कि बच्चों की खेाजी प्रवृति मृत्त अवस्था में न जा सके, बच्चों की खोजी प्रकृति को शिक्षा एवं ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया से जोड़ने हेतू सर्वोत्तम उपाय होगा कि बच्चों को गृहकार्य इस प्रकार प्रदान किया जाए कि बच्चें पुराने ज्ञान का परिमार्जन कर नवीन ज्ञान का सृजन करे। जैसे- किसी जानवर के विषय में खोज करे एवं रिर्पाट बनाये। गाॅव के रहन-सहन एवं जीवनचर्या के बारे रिपोर्ट बनाये।  

अन्त में: हम कहेगें कि बच्चांे की शिक्षा ज्ञान रचना आधारित होनी चाहिए, न रटन एवं स्मृति आधरित। गृहकार्य भी शिक्षा का अभिन्न अंग हैं, किन्तु गृहकार्य प्राथमिक स्तर पर नहीं प्रदान किया जाना चाहिए, प्राथमिक स्तर की शिक्षा में बच्चों को स्वतंन्त्र छोड़ देना चाहिए जिससे उनमें सृजनात्मक चिंतन का विकास हो सके न की गृहकार्य रूपी बोझ प्रदान कर दिया जाए। प्राथमिक स्तर पर गृहकार्य दिये भी जाये तब केवल अवलोकन आधारित गृहकार्य ही प्रदान किये जाए, जो उनके दैनिक जीवनचर्या से जुड़ा हो।