ट्यूशन एवं शिक्षा का ताना बाना 

वर्तमान शिक्षा की कमियों के रूप में दृष्टिपात किया जाए तो सबसे बड़ी कमी के रूप में दृष्टिगोचर होता है- बालकों में सृजनात्मकता की कमी। जिसके कारणों में से एक मूल कारण है-ट्यूशन। ट्यूशन का प्रतिपादन इस सिद्धांत के रूप में लाया गया कि जो बालक कक्षा में अन्यों से या शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए हैं या वह किसी विषय विशेष में सीखने में कमजोर हैं, तथापि उन्हें अतिरिक्त शिक्षण द्वारा सहायता प्रदान कर शैक्षिक पिछड़ेपन एवं विषय सम्बन्धि कमजोरी को दूर करना है। वर्तमान सामाजिक व्यवस्था का अवलोकन करने पर यह ज्ञात होता है कि ट्यूशन एक प्रथा ;प्रचलनद्ध के रूप में चलन हैं, प्रत्येक अभिभावक इस बात पर चिंतन नहीं करते हैं कि क्या उनके बच्चें को अतिरिक्त शैक्षिक सहायता की आवश्यकता है या नहीं है। केवल वे एक दूसरे की देखा-देखी ;एक दूसरे की नकल कर अपने बच्चों को ट्यूशन केन्द्रों पर भेज देते हैं। 

ट्यूशन देने का कार्य एक प्रशिक्षित शिक्षक करे, यह अनिवार्य नही हैं। अगर वर्तमान में हम चारांे ओर दृष्टि डालते है परिणामतः प्राप्त होता है कि अधिकतम ट्यूशन देने वाले शिक्षक अप्रशिक्षित हैं, जिन्हें न तो शिक्षण के तरीके तथा न ही बालको के मानसिक स्तर एवं न ही उनकी आवश्यकता का ज्ञान होता है। साथ ही इस प्रकार के शिक्षक बाल मनोविज्ञान से भी परिचित होते हैं, जिस कारण इन शिक्षकों का शिक्षण केवल स्मृति आधारित होता है न की बोध आधारित। उन्हें यह ज्ञान भी नहीं होता है कि बच्चों की किस प्रकार से अतिरिक्त शैक्षिक सहायता की जाए। अप्रशिक्षित शिक्षक ज्यादा से ज्यादा रटन की प्रवृति को बढ़ावा देते हैं, क्योंकि इस प्रकार के शिक्षक पुस्तकीय ज्ञान से इतर बालकों को शिक्षण कार्य नहीं करते हैं, क्योंकि इन शिक्षकों का शिक्षण करने का एक मात्र उद्देश्य धनोपार्जन करना होता हैं। कुछ होमट्यूटर ;घर पर शिक्षण कराने वाले शिक्षकद्ध केवल बालकों का गृहकार्य ही पूरा कराते हैं। यूनेस्को की वैश्विक निगरानी रिपार्ट ;2016 में भारतीय शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी कुछ खमिया बताई गई हैं, इस रिपोर्ट में ट्यूशन को भारतीय शिक्षा के लिए नुकसानदायक बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबित ट्यूशन विद्यार्थियों पर पढ़ाई का बोझ बढ़ाता है, हालांकि व्यक्तिगत सहायता से विद्यार्थियों को थोड़ा लाभ होता है किन्तु ट्यूशन पर खर्च होने वाला धन विद्यार्थियों की देखभाल को कमजोर करता है साथ ही भारतीय शिक्षा में असमानता को भी बढ़ाता हैं।