सामाजिक विज्ञानं शिक्षण द्वारा समीक्षाई चेतना का विकास
प्रस्तुत लेख में शोधार्थी ने समीक्षाई चेतना की प्रक्रिया का वर्णन किया है। साथ ही सामाजिक विज्ञान विषय के शिक्षण द्वारा बच्चों में समीक्षाई चेतना का विकास कैसे किया जा सकता है पर चर्चा की है। शोधार्थी ने शोध को तीन भागों में विभाजित किया है। प्रथम भाग में समीक्षाई चेतना क्या होती है? तथा सामाजिक विज्ञान विषय एवं उसके शिक्षण के साथ क्या-क्या समस्याएं हैं? इन बिंदुओं पर चर्चा की है। वहीं शोध के दूसरे भाग में सामाजिक विज्ञान विषय की शिक्षण प्रक्रिया किस प्रकार की जाए? बिन्दू पर चर्चा की है। शोध के अंतिम भाग में सामाजिक विज्ञान विषय शिक्षण द्वारा बच्चों में समीक्षाई चेतना के विकास की प्रक्रिया का वर्णन किया है। जिसमें शोधार्थी ने बतलाया है कि सामाजिक विज्ञान की कक्षा शिक्षण की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण तत्व होता है कि कक्षा को बच्चे की वास्तविक दुनिया से जोड़ा जाये। न की कक्षा में प्राप्त सूचनाओं के बाद उन सूचनाओं को बच्चा अपने वास्तविक दुनिया से जोड़े। यदि कक्षा को बच्चे की वास्तविक दुनिया के जोड़ कर शिक्षण किया जाती है, तब वह कक्षा रोचक एवं बच्चे के अनुकूल हो जाती है। जिससे बच्चा उस कक्षा में जो भी सूचनाएं पाता है उन्हें अपनी वास्तविक दुनिया के साथ जोड़कर परीक्षित एवं परिष्कृत करता है। जब सूचनाओं के परिष्करण की प्रक्रिया बच्चें के मस्तिष्क में चलती है। तब बच्चें के मस्तिष्क में कई विचार विभिन्न आयामों में उत्पन्न होते है, जो समीक्षाई चेतना के लिए महत्वपूर्ण होता है।
प्रस्तावना
हम शोध के चर्चा की शुरूआत कृष्ण कुमार (2016) की पुस्तक में उद्धित पंक्तियों के कुछ अंश से प्रारंभ करेगे। पढ़ने का समकालिक संदर्भ काफी जटिल है। आमतौर पर इसकी जटिलता को संचार की तकनीकी में हुए विकास और उसके ज़रिए आए सामाजिक व शैक्षिक परिवर्तनों से जोड़ा जाता है। मगर पढ़ने के संदर्भ में जटिलता का एक अन्य स्त्रोत भी है। वह है पढ़ने को लेकर विकसित हुआ शिक्षणशास्त्र। शिक्षा के मनोविज्ञान का सामाजिक संदर्भ लगातार रोचक होता जा रहा है। वर्तमान में कई मुद्दों पर चर्चा की जा रही है कि पढ़ने-लिखने जैसी प्रक्रियाओं से उपजी मानसिक सक्रियता किस हद तक स्वंय अपने प्रति जागृत होती है। आम भाषा में आजकल इस प्रसंग को ’क्रिटिकल थिंकिंग’ या समीक्षाई चेतना के नाम से जाना जाता है। इसका आशय है ऐसी समझ जो स्वयं पर सोच सके। उदाहरण के लिए यदि बच्चे को मालूम है कि पानी ऑक्सीजन और हाइड्रेजन से मिलकर बनता है तो कही बदबुदार पानी पीते समय उसे यह ज्ञान याद आए और इस सम्भावना के प्रति चेता दे कि इस पानी में जरूर कोई अन्य गैस या अन्य चीज मिली होगी। समीक्षाई चेतना दिमाग की जागृत अवस्था का संकेत है।
प्रस्तुत शोध में सामाजिक विज्ञान विषय के शिक्षण की प्रक्रिया किस प्रकार की जाए कि बच्चे कक्षा में शिक्षण के साथ संलग्न हो जाये? तथा सामाजिक विज्ञान विषय के शिक्षण के माध्यम से बच्चों में समीक्षाई चेतना का विकास किस प्रकार किया जा सकता है? बिन्दूओं पर चर्चा करेंगे। इस शोध को करने का प्रमुख उद्देश्य है कि सामाजिक विज्ञान विषय शिक्षण क्या समीक्षाई चेतना के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है? इन प्रश्नों के उत्तर ढुढ़ने से पहले हम सामाजिक विज्ञान को लेकर विद्यार्थियों के मस्तिष्क में क्या संचालित होता है, उन तत्वों को जानेगे। वर्तमान समय में सामाजिक विज्ञान विषय के संदर्भ में बात की जाए। यह कहा जायेगा कि सामाजिक विज्ञान विषय को रोजगार के दृष्टिकोण से अनुपयोगी, व्यर्थ एवं अनावश्यक समझा जाता है (बत्रा, 2011)। इस विषय को मात्र सूचना प्रदाता के रूप में माना जाता है, इस विषय को भूतकाल की सूचना प्रदाता मानना। इस विषय की एक और कमी के रूप में दैनिक जीवन से जुड़ा हुआ नही माना जाना। इस विषय के प्रति ये कुछ कमिया है जो विद्यार्थियों के मन एवं मस्तिष्क में बैठ चुकी है (वैटिल, 2011)।
सामाजिक विज्ञान विषय से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा करना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि एक शिक्षक जब कक्षा में शिक्षण करने जाता है, तब उसको ज्ञात होना यह आवश्यक है कि विषय के प्रति कक्षा में सम्मिलित विद्यार्थियों के मन एवं मस्तिष्क में किस प्रकार की धारणा एवं विचार व्याप्त है। अपितु उपर्युक्त प्रकार की धारणा विद्यार्थियों के मस्तिष्क में व्याप्त है तब शिक्षक कक्षा को एक सुत्र में नही बाध पायेगा क्योकि बच्चों की अभिप्रेरणा एवं रूची विषय के प्रति बहुत ही निम्न स्तर पर होगी। जिससे शिक्षक को शिक्षण करते समय विद्यार्थियों को शिक्षण के साथ जोड़ने में बाधा हो जाती है। शिक्षण की प्रक्रिया दो तरफा न होकर केवल एक तरफा हो जाती है। कक्षा सजीव रूप में न होकर निर्जीव, बेअसर एवं निरस बन जाती है (गहलोत, 2013)। जिससे विद्यार्थियों के साथ-साथ शिक्षक भी प्रभावित होता है। शिक्षक की खुद की रूची एवं अभिप्रेरणा कक्षा में कम होने लगती है। जो शिक्षा प्रणाली के लिए घातक सिद्ध होती है और शिक्षा एवं शिक्षण गुणवत्ता से कोशों दूर रह जाते है।
सामाजिक विज्ञान विषय में समाज की विविध चिंताओं को समाहित करता है और इसमें इतिहास, भूगोल, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के विषयों से तैयार एक विस्तृत सामग्री शामिल है। इसलिए, सामाजिक विज्ञान शिक्षण को एक इंटरैक्टिव वातावरण में ज्ञान और कौशल प्राप्त करने में मदद करने की दिशा में पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है (बत्रा, 2011)। सीखने की प्रक्रिया को सहभागी बनाने के लिए सूचना को बहस और चर्चा तक सीमित करने से प्रक्रिया तक स्थानांतरित करने की आवश्यकता है। सीखने के लिए यह दृष्टिकोण शिक्षार्थी और शिक्षक दोनों को सामाजिक वास्तविकताओं के लिए जीवित रखेगा। सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम सामग्री और कार्यप्रणाली दोनों में काफी बदलाव आया है। यह अक्सर देखा गया है कि पाठ्यक्रम में किए गए वादों और बच्चे की धारणा के स्तर पर क्या हो रहा है के बीच खाई बढ़ी है। इसलिए, छात्रों को समाज की आलोचनात्मक समझ विकसित करने में सक्षम बनाने के लिए संसाधनों का चयन और संगठन एक चुनौतीपूर्ण कार्य है (एन.सी.आर.टी., 2007) । शिक्षण को शिक्षकों और छात्रों को एक साथ सीखने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए, इस प्रकार से संस्थानों के भीतर एक लोकतांत्रिक संस्कृति का विकास होता है।
सामाजिक विज्ञान विषय का अध्ययनः
इस भाग में सामाजिक विज्ञान विषय को प्रारंम्भिक एवं माध्यमिक स्तर पर क्यों अध्ययन कराया जाता है? इसके अध्ययन कराने का क्या उद्देश्य है? विन्दूओं पर चर्चा करेंगे। जिसमें प्रथम विन्दू सामाजिक विज्ञान अध्ययन कराये जाने का उद्देश्य क्या होता है? पर चर्चा की जायेगी। सामाजिक विज्ञान विषय बच्चे के दैनिक जीवन में घटित होने वाली घटनाओं से संबंधित होता है। क्योंकि सामाजिक विज्ञान विषय के अर्न्तगत आने वाले विषय इतिहास, नागरिकशास्त्र, भूगोल एवं अर्थशास्त्र। सभी विषय जीवन से जुड़े हुए है, साथ ही कही न कही दैनिक जीवन को आच्छादित किये हुए है। सरल शब्दों में चर्चा करे तब हम इतिहास विषय के संदर्भ में प्राप्त करते है कि इतिहास विषय की विषय वस्तु भूत की घटनाओं से जुड़ी होती है किन्तु उनका प्रभाव वर्तमान पर क्या है। इस उद्देश्य के साथ ही इतिहास विषय का शिक्षण किया जाता है। वे भूतकाल की घटनाएँ आज को बनने या संरचित करने में किस प्रकार मद्द की है, इतिहास विषय को पढ़नें का उद्देश्य होता है। उसी प्रकार भूगोल विषय के अध्ययन का उद्देश्य आस पास की प्रकृति को समझना एवं जानना होता है। बच्चें उन प्राकृतिक घटनाओं एवं वस्तुओं के प्रति जागरूक बन सके (भोकुनी, 2017)। जो उनके जीवन को संचालित या प्रभावित करती है। नागरिक शास्त्र एवं अर्थशास्त्र विषय का उद्देश्य बच्चों को इस प्रकार की ज्ञान प्रदान करना कि वे उस ज्ञान को स्कूल की बाहर की दुनिया से जोड़ सके। ये उद्देश्य प्रारंम्भिक शिक्षा से लेकर माध्यमिक शिक्षा तक होती है।
सामाजिक विज्ञान मानव समाज का अध्ययन करने वाली शैक्षिक विधा है। यह प्राकृतिक विज्ञानों के अतिरिक्त अन्य विषयों का एक समूह है। इन विषयों की अपनी अलग-अलग सीमाएँ हैं। परन्तु हमें इन सीमाओं को खोलना है। जब तक हम सभी विषयों के आपसी सम्बन्धों और जुड़ाव को बच्चों को अच्छे से नहीं समझाएँगे तब तक सामाजिक विज्ञान के शिक्षण का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज किस तरह काम करते हैं, इसके बारे में सामान्य जानकारी होने से विद्यार्थियों को उनकी आगे की जिन्दगी में यह समझने में मदद मिलेगी कि सार्वजनिक जीवन में नीतियों की क्या भूमिका होती है। जब हम इतिहास पढ़ाते हैं तो हमें बच्चों को यह समझाना होगा कि इतिहास केवल घटनाओं और तिथियों का विषय नहीं है बल्कि इसकी सहायता से संसार को और भी सुन्दर बनाया जा सकता है (चोपता, 2017)। सामाजिक विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण कार्य शिक्षित व समझदार नागरिक तैयार करना है। लोकतंत्र के अच्छे संचालन के लिए शिक्षित नागरिक वर्ग का होना आवश्यक है। अच्छे नागरिक के गुण हासिल करने और बढ़ावा देने के लिए एक खास प्रकार की शिक्षा की जरूरत होती है। एक अच्छा नागरिक बनने के लिए उसे उस सामाजिक संसार के बारे में भी समझना होगा जिसका वह हिस्सा है। इसके लिए यह जरूरी है कि उन्हें सामाजिक व प्राकृतिक दुनिया के बारे में स्पष्टता से और व्यवस्थित ढंग से सोचने के लिये प्रोत्साहित किया जाए। आगे शोध में सामाजिक विज्ञान शिक्षण की क्या महत्ता है। यह जीवन से कैसे जुड़ा हुआ है। विन्दूओं पर चर्चा की जायेगी।
सामाजिक विज्ञान शिक्षण की प्रक्रियाः
विज्ञान और गणित जैसे विषयों को पढ़ाते समय शिक्षक की अपनी व्यक्तिगत पसन्द या नापसन्द के लिए बहुत कम सम्भावनाएँ हैं। परन्तु सामाजिक विज्ञान के साथ ऐसा नहीं है। इसलिए हमें इस विषय को पढ़ाते समय अपनी व्यक्तिगत पसन्द- नापसन्द, अपना दृष्टिकोण और पूर्वाग्रहों को दूर रखना होगा ताकि तथ्यों की व्याख्या और विश्लेषण गौण न हो जाएँ। इसलिए हमें अनावश्यक उपदेश देने से बचना चाहिए। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि हम अपने बच्चों के भीतर सही मूल्यों के बीज न बोएँ। हमारे संविधान में भी बुनियादी मूल्यों को शामिल किया गया है। इन मूल्यों को न केवल विद्यार्थियों को समझाना चाहिए बल्कि उन्हें प्रेरित भी करना चाहिए कि वे इन मूल्यों को अपने जीवन में अपनाएँ। हमें उन्हें धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक और आधुनिक मूल्यों की शिक्षा भी देनी है। हमें उनके अन्दर एक ऐसे भारत का निर्माण करने का संकल्प जगाना है जो बहुलतावादी समाज का सम्मान करे। हमें उन मूल्यों को समझाना होगा जो शान्ति, मानवता और सांस्कृतिक विविधता वाले समाज में सहिष्णुता पैदा करते हैं। देश की विविधता की उपेक्षा न करते हुए उन्हें राष्ट्रीय एकता का पाठ पढ़ाना है। उन्हें सामाजिक न्याय और समानता के मूल्यों को समझाना होगा। उनके भीतर दलितों, महिलाओं, आदिवासियों, विशेष आवश्यकता लोगों (विकलांगों) और अल्पसंख्यकों के प्रति संवेदनशीलता पैदा करनी होगी। उनमें धर्माधंता और पूर्वाग्रहों के खतरनाक आकर्षण को अस्वीकार करने की समझ व क्षमता विकसित करनी पड़ेगी (जोशी, 2017)। हमें उनमें ऐसी समझ विकसित करनी होगी कि वे पुराने को इसलिए न नकार दें कि वह पुराना है और हर नए को इसलिए न स्वीकारें कि वह नया है, बल्कि उसका निष्पक्ष रूप से विश्लेषण करें। हमें उनमें सभी के प्रति चाहे वे किसी भी धर्म या जाति के हों, समान आदरभाव पैदा करना होगा (बत्रा, 2011)।
सामाजिक विज्ञान का लक्ष्य मनुष्यों और समाज में मौजूद मानव समूहों की एक सामान्य और समीक्षात्मक समझ विकसित करना है। सामाजिक विज्ञानों का सरोकार सामाजिक संसार के विवरण, उसकी व्याख्या और उसके बारे में पूर्वानुमान लगाने से है। सामाजिक विज्ञानों की प्राक्कल्पना सामूहिक जीवन में मानव व्यवहार के बारे में होती है और उनकी वैधता अंततः समाज में किए गए अवलोकन पर भी निर्भर करती है। ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया में अन्य विषय और सामाजिक विज्ञान लगभग एकसमान होते हैं लेकिन उनमें दो भेद भी हैं, जो शिक्षण की योजना बनाने के लिए बहुत ही प्रासंगिक हैं। प्रथम, सामाजिक विज्ञान मानव व्यवहार का अध्ययन करते हैं जिसका आधार तर्क होता है। दूसरे, सामाजिक विज्ञानों के निष्कर्ष बहुधा नैतिकता और वांछनीयता के सवाल उठाते हैं।
समीक्षाई चेतना (क्रिटीकल थिंकिंग):
समीक्षाई चितंन से अभिप्राय होता है कि बच्चा विषय वस्तु के सकारात्मक एवं नकारात्मक पक्षों पर ध्यान देते हुए, विषय वस्तु का विश्लेषण करे। बच्चा जब किसी विषय वस्तु पर चितंन वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ करे। बच्चा समस्या या विषय वस्तु के सभी पक्ष की उपयोगिता का ध्यान रखते हुए, उनका विश्लेषण करे, तथा इन पक्षों का क्या प्रभाव हो सकता है की व्याख्या करे। ये समीक्षाई चितंन के कुछ पक्ष है। किसी बच्चें में विचारों के समीक्षाई चितंन किस रूप में होता है। समझने के लिए बैडविड्थ की प्रक्रिया का उपयोग करते है। अवलोकन के पश्चात बच्चें में विचारों की उत्पत्ति होती है, वे विचार सकारात्मक पक्ष की तरफ चलते हुए एक स्थान विशेष पर जाकर रूक जाते है जिसे विचारों का जकंशन कहा जा सकता है। जंकशन पर रूकने के पश्चात विचार नकारत्मक पक्ष की तरफ परिचरण करते है। इसके पश्चात उस आधार बिन्दू पर आ जाते है जहॉ से संचालित हुए होते है। उसके समान विन्दू पर न की उसी स्थान पर। उस विन्दू पर प्रतिक्रिया के रूप में विचारों की उत्पत्ति होती है। वही विचार समीक्षाई चितंन के रूप में परिलक्षित होते है।
किन्तु जब हम सामाजिक विज्ञान विषय की बात करते है तब पाते कि विषय की संरचना इस प्रकार की जाती है कि केवल सुचनाओं का भण्डार सा दिखता है (साहा, 2011)। किन्तु अब पाठ्यचर्या में बहुत परिवर्तन किया गया। पाठ्यचर्या को ज्यादा से ज्यादा जीवन से जोडकर निर्मित किया गया। पाठ्यचर्या में उपस्थित इन सुचनाओं के भण्डार को हम शिक्षण के माध्यम से समीक्षाई चितंन का विकास किया जा सकता है। जिससे बच्चा इन सुचनाओं को ज्यादा से ज्यादा अपने व्यवहारिक जीवन से जोड़ सके। जैसे कि हम किसी कक्षा में आयात एवं निर्यात पर शिक्षण करते है तब हम शिक्षण के समय विभिन्न माध्यमों का उपयोग करते हुये। आयात के सकारात्मक पक्षों एवं नकारात्मक पक्षों पर बच्चा अपनी समझ बना सकें। इसप्रकार के शिक्षण का प्रयास करते है। माना कि हमने कक्षा में चावल के निर्यात एवं तेल के आयात पर चर्चा करते है। तब हम देखते है कि कक्षा में बच्चें चावल का निर्यात किस देश एवं कितनी मात्रा में किया जा रहा है तथा क्या हमारे पास अगले उत्पादन तक खाने के लिए चावल उपलब्ध है। तेल क्यो आयात किया जा रहा है। कितनी तेल की खपत है खपत के अनुपात हम कितना उत्पादन कर रहे। तथा खपत को हम नियंत्रित कर सकते है कि नही। आदि विन्दुओं पर जब बच्चें कक्षा में चर्चा करने लगे। तब काफी हद तक कहा जा सकता है कि बच्चें तथ्यों के प्रति समीक्षाई चितंन प्रस्तुत कर रहे है।
सर्वप्रथम उस प्रक्रिया पर चर्चा करेगे जो सामाजिक विज्ञान के शिक्षण को रोचक एवं उपयोगिता प्रदान करे। सर्वप्रथम हम वर्तमान में देखते है कि सामाजिक विज्ञान विषय के शिक्षण को केवल सुचना पहुचाने के उद्देश्य के रूप में किया जा रहा है (जोशी, 2017)। साथ ही बच्चा एक अच्छा सामाजिक नागरिक बन पाये। इस उद्देश्य पुर्ति के लिए शिक्षण किया जाता है। क्या हमने चितंन करने का प्रयास किया है कि हम क्यों बच्चें को समाज के अनुकूल बनाने का प्रयास करते है। क्या हम समाज को बच्चें के अनुकूल बनने के उद्देश्य से शिक्षण का प्रयास करते है। मै मानता हूँ कि समाज की प्रक्रिया का ज्ञान बच्चें को होना अति आवश्यक है। सामाजिक विज्ञान विषय का शिक्षण करते समय हमारा उद्देश्य केवल सामाजिक प्रक्रिया ज्ञान करना ही आवश्यक नही है अपितु समाज की प्रक्रिया ऐसे क्यो संचालित की जा रही है, बच्चा प्रश्न कर सके एवं समाज के संचालन की इस प्रक्रिया को अपने अनुभवों से जोड़कर देख सके (तिवारी, 2011)। और जब ये प्रक्रिया उसके अनुभव पर उपयुक्त रूप से न वैठे, तब वह उनपर अपनी प्रतिक्रिया दे सके।
सामाजिक विज्ञान शिक्षण द्वारा समीक्षाई चितंन का विकासः
सामाजिक विज्ञान विषय द्वारा शिक्षण की प्रक्रिया किस प्रकार की जाए कि बच्चों में समीक्षाई चितंन का विकास हो सके? शोध के इस भाग में इस प्रश्न का उत्तर ढुढ़ेगे। हम कुछ उदाहरण के रूप में कक्षा में समीक्षाई चेतना का विकास कैसे संभव है समझने का प्रयास करेगे। जैसे कक्षा में शिक्षक चुनाव की प्रक्रिया का अध्यापन करवा रहा है। तब शिक्षक के लिए यह आवश्यक है कि वह बच्चे के बाहरी दुनिया के ज्ञान को कक्षा में उपस्थित करे। बच्चों के वास्तविक जीवन अनुभवों को अध्यापन से जोड़कर, अध्यापन की प्रक्रिया को रोचक बनाया जा सकता है (एन.सी.एफ.2005) । इस हेतु शिक्षक निम्न तरिकों का इस्तेमाल कर सकता है। जैसे कि- कक्षा में कक्षा नायक के चुनाव करवाना, जिसमें प्रत्येक विद्यार्थी की भूमिका एवं भागीदारी सुनिश्चित हो। कक्षा नायक की चुनाव की प्रक्रिया के बाद शिक्षक कक्षा के प्रत्येक विद्यार्थी से कुछ विन्दूओं पर प्रश्नों के माध्यम से चर्चा कर सकता है। जैसे- आपने क्यों नहीं कक्षा नायक के लिए चुनाव लड़ा? आप किन कारणों से कक्षा नायक के रूप में चुनाव लड़ने की प्रक्रिया से दूर रहे? आपकी नजर में कक्षा नायक में कौन-कौन से गुण होने चाहिए? आप की कक्षा में कक्षा नायक की आवश्यकता क्यों है? आदि प्रश्नों पर चर्चा कर कक्षा के प्रत्येक विद्यार्थी के दृष्टिकोण ज्ञात किया जा सकता है। विद्यार्थियों के दृष्टिकोणों में कई दृष्टिकोण सकारात्मक कई नकारात्मक बिंदुओं की तरफ हो सकते हैं (सनी, 1996)। जो बच्चों के वास्तविक जीवन अनुभवों से प्रभावित हो सकते हैं। इस प्रकार कक्षा में बच्चों के वास्तविक जीवन के अनुभवों को के साथ साथ समीक्षाई दृष्टिकोण को भी विकसित किया जा सकता है।
शिक्षक कक्षा में सौरमंडल में पृथ्वी के अध्यापन करवा रहा है, वह बच्चों के साथ चर्चा करता है कि सौरमंडल में पृथ्वी ही केवल एक महत्वपूर्ण ग्रह है, जिस पर जीवन व्याप्त है तब बच्चा कहता है कि सर क्या पृथ्वी ही जीवन है। सौरमंडल में जिस पर जीवन है यह बच्चे की जिज्ञासा होती है किंतु जब बच्चा कहता है कि मनुष्य पेड़ पौधों को इसी प्रकार काटता रहा तो पृथ्वी भी उन्हीं ग्रहों के समान बन जाएगी जो सौर मंडल में अन्य ग्रहों की स्थिति है। तब समझा जायेगा कि बच्चे ने समझाई चेतना का उपयोग किया है। उसी प्रकार एक अन्य स्थिति के द्वारा भी सामाजिक विज्ञान अध्यापन की क्या भूमिका हो सकती है समीक्षाईं चेतना में देखने का प्रयास करते हैं। शिक्षक कक्षा में संसाधन विषय पर चर्चा करता है और बच्चा जान जाता है कि जो मूल्यवान एवं उपयोगी है, वह संसाधन हो सकता है। जब बच्चा घर में होता है रसोई घर में खराब सब्जियों एवं ताजी सब्जियों को देखकर यह चिंतन करता है कि जो सब्जी ताजी है उसका मूल्य है। क्योंकि वह भोजन बनाने के काम आ सकती है और जो खराब सब्जी है, भोजन बनाने की काम नहीं आ सकती है। इसलिए ताजी सब्जियां संसाधन है। तथा खराब सब्जियां संसाधन नहीं हो सकती क्योकि खराब सब्जि को भोजन के रूप में उपयोग नही किया जा सकता है। तब बच्चा इस तरह का चिंतन करता है तो वह समीक्षाई चेतना माना जाता है।
एक अन्य उदाहरण के रूप हम पाते है कि जब कक्षा में शिक्षक हमारी विरासत विषय पर बच्चों से चर्चा करता है। और वह बतलाता है कि जो प्राचीन कालिन स्थल या स्मारक होते हैं (हिमालय, 2013) और जो कला कलाकृतियों का नमूना होती हैं। वह हमारी विरासत होते हैं। जैसे लाल किला, ताजमहल देश की धरोहर एवं विरासत हैं। तब बच्चा जो उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले का रहने वाला है। यह चिंतन करता है कि हमारे सैदपुर के पास भीतरी गाव में स्थित अशोक कालीन प्राचीन स्तंभ भी हमारी विरासत का अंग है। तब माना जाएगा की बच्चे ने समीक्षाई चेतना का उपयोग किया है। इन स्थितियों के आधार पर कहा जाएगा कि शिक्षण की वह प्रविधि जो बच्चों को उनकी वास्तविक दुनिया के अनुभव से जोड़ती है साथ ही कक्षा में उनकी वास्तविक अनुभव को कक्षा में उपस्थित कर शिक्षण किया जाता है। तब इस प्रकार के शिक्षण प्रक्रिया के द्वारा बच्चों में समीक्षाएं चेतना का विकास किया जा सकता है।
अंत में:
हम कहेंगे कि सामाजिक विज्ञान केवल सूचना प्रदान करने वाला विषय नहीं है। अपितु सामाजिक विज्ञान विषय द्वारा बच्चों में सृजनात्मक एवं समीक्षाई चेतना का विकास किया जा सकता है। यद्यपि शिक्षक यह मानकर चलता है कि सामाजिक विज्ञान को केवल सूचना प्रदाता के रूप में ही उपयोग किया जा सकता है तो यह सामाजिक विज्ञान के साथ अन्याय होगा क्योंकि सामाजिक विज्ञान समाज से जुड़ा हुआ विषय होता है। सामाजिक विज्ञान की कक्षा में ज्यादातर सूचनाएं बच्चे की वास्तविक जीवन से जुड़ी हुई होती हैं। जो कहीं ना कहीं बच्चे की वास्तविक जीवन को प्रभावित भी करती है। इसलिए सामाजिक विज्ञान शिक्षण करते समय अध्यापक को यह ज्ञात होना महत्वपूर्ण हो जाता है, कि इस विषय के शिक्षण को बच्चे के वास्तविक दुनिया के साथ जोड़े। जिससे बच्चा कक्षा में अपनी वास्तविक दुनिया का अनुभव कर सके। महात्मा गांधी का बुनियादी शिक्षा का सिद्धान्त कहीं न कहीं बच्चे को उसकी वास्तविक दुनिया से जोड़ने का प्रयास था। जब कक्षा को वास्तविक दुनिया के साथ जोड़ा जाता है। तब बच्चों के मन में तरह-तरह के प्रश्न खड़े होते हैं उन प्रश्नों के प्रति प्रतिक्रिया देते हुए बच्चों के मस्तिष्क में कई तरह के विचार उत्पन्न होते हैं। कुछ विचार सार्थक हो सकते हैं, कुछ विचार निरर्थक हो सकते हैं। किंतु इन विचारों का महत्व अपने आप में महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इससे बच्चा चिंतन करने का प्रयास करता है इससे उसकी समझ विकसित होती है जिस कारण बच्चा विषय वस्तु पर कई आयामों से सोचता है। जो समझाई चेतना का महत्वपूर्ण घटक है। इस प्रकार हम कहेंगे कि सामाजिक विज्ञान विषय के शिक्षण द्वारा भी समीक्षाई चेतना का विकास किया जा सकता है।
नोटः कुछ ग्रंथों का उपयोग केवल समझ विकसीत करने के लिए किया गया है। एवं यह शोध डाक्टरोल कोर्स वर्क के दौरान क्षेत्र भ्रमण (फिल्ड विजिट) के दौरान प्राप्त अनुभवों के आधार पर संरचित किया है।
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