आदिवासी शिक्षा : आज और कल
image right have google
सारांश:
प्रस्तुत शोध में शोधकर्ता ने आदिवासी शिक्षा को संदर्भित कर
अपना लेख प्रस्तुत किया है, जिसमे आदिवासी शिक्षा की वर्त्तमान स्थिति एवम भविष्य
की बात की गई है कि वर्त्तमान अन्धकार की स्थिति से निकल कर भविष्य के प्रकाश के
मार्ग पर चल सके और सामाजिक निम्न वर्ग से निकल कर आदिवासी समाज मुख्य धारा में
जुड़ जाये, जो देश की प्रगति में बराबर का भागीदार बन जाये, एवम आदिवासी शिक्षा से
सम्बंधित जीतनी भी योजनाये है उनका सफल सञ्चालन हो, जो आदिवासीओ को संबैधानिक
आधिकार प्राप्त है उनका उन्हें ज्ञान हो जाय जिससे उनका शोषण न हो सके और वे अपनी
परम्परा एवम संस्कृति को संरक्षित कर सके और उनके गौरवपूर्ण इतिहास का साक्षी
वर्त्तमान समाज बने एवम आने वाली हमारी पीढ़ीया भी रूबरू हो सके |
भूमिका: “शिक्षा सबसे ताकतवर हथियार है जिसका इस्तेमाल आप दुनिया बदलने के लिए कर सकते है ’’-नेल्सन मंडेला
“जब एक किसान अपने हाथो में बन्दुक उठता है, तब पुराने मिथक धुधले पड़ने लगते है और एक एक करके वर्जनाए विस्मृत होने लगाती है | एक विद्रोही का हथियार उसकी इंसानियत का सबूत है”- ज्या पाल् सात्रे (रेचेड आफ दि अर्थ की भूमिका)
भारतीय संबिधान की पाँचवी अनुसूची में आदिवासियों को ‘अनुसूचित जनजाति’ के रूप में मान्यता प्राप्त है आदिवासी मुख्य रूप से भारत के उड़ीसा मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात महाराष्ट्र ,आन्ध्रप्रदेश बिहार, झारखंड तथा पश्चिम बंगाल के राज्यों में अल्पसंख्यक रूप में तथा पूर्वोत्तर राज्यों जैसे कि मिजोरम इत्यादि स्थानों पर बहुसंख्यक रूप में है।
मानव एक समाजिक प्राणी है वह समाज में जन्म लेता है तथा समस्त सामाजिक क्रिया कलाप करते हुए वही पर मृत्यु को प्राप्त होता है। मनुष्य अपने सवतंत्र अस्तित्व के साथ समाज के हित को ध्यान में रखकर एक साथ जीवन यापन कर मानवता का परिचय देता है कोई भी समाज तभी तक संगठित रहता है जब तक की उस समाज में सामाजिक व्यवस्था बनी रहती है चुकी विकास हेतू, उस समाज की सामाजिक व्यवस्था को जानना अति आवश्यक है उस समाज की सामाजिक स्तर को पहचान कर उसको ऊचा उठाने हेतू शिक्षा एक महत्वपूर्ण इकाई के रूप में कार्य करती है ।
शिक्षा ही वह साधन है
जिसके माध्यम से हमारे जैसे आधुनिक समाज में व्यक्ति और वर्ग सामाजिक परिवर्तन
लाते है | शिक्षा सामजिक व्यवस्था के पुनर्निर्माण का भी माध्यम है जो सामान्यत:
पदानुक्रम रूप में व्यवस्थित है और जहा सर्वत्र असमानताए व्याप्त है भारतीय समाज
में, जो अनिवार्य और एतिहासिक रूप से जातीय आधार पर संरचित है, जहा सामाजिक
असमनाताये प्राथमिक तौर पर जातीय आधार पर बनती और नए सिरे से पनपती रहती है
सामाजिक हैसियत राजनितिक भागीदारी और शैक्षिक अवसरों के संदर्भ में कुछ जातीया
विशेषाधिकार प्राप्त है और कुछ नहीं है अनुसूचित जनजातियो जैसी जातीया जो विशेषधिकार
से वंचित है वे परम्परागत पेशेवर वर्गीकरण के सबसे निचले पायदान पर है और उन्हें
विशेषकर ग्रामीण समाज में आमतौर पर समाज की स्थानिक एवं सामजिक सीमायों से दूर रखा
जाता है इसी तरह मोते तौर पर भारतीय समाज में हाशिए पर रहा एक वर्ग अनुशुचित
जनजातियो का है जो भौगोलिक रूप से अलग थलग,तथा कथित व्यवस्थित मुख्यधारा सभ्य समाज
से दूर जंगलो पहाड़ो और दुर्गम इलाकों में अपनी अनोखी संस्कृतियों धार्मिक पद्तीयो
भाषायो और जीवन शैलियों के साथ रहती है झा एक इस वर्ग का जीवन भारतीय समाज के अन्य
सामाजिक वर्गों से भिन्न है वही उनके जीवन में आसपास की प्राकृति के साथ एक अनोखी समकालिक
भी है हलाकि भौगिलिक अलगाव के कारण विकसित समाज के सामजिक आर्थिक राजनितिक एवम
शैक्षिक क्षेत्रो में इन वर्गो की भागीदारी भी असमान रही है |
इसके परिणाम
स्वरूप, ये जनजातीय कई दशको और सदियों तक सामाजिक आर्थिक विकास के हाशिये पर है और
पराधीन एवम वंचित जीवन बिताने को बाध्य है, ये जनजातीय सामाजिक मुख्यधारा से भी
बिल्कुल अलग थलग रही है | हालांकि स्वाधीनता के पश्चात्, भारत को लोकतान्त्रिक
समाज बनाने, सभी नागरिको को उनकी सामाजिक पहचान और उनके वर्ग की परवाह किए बगैर,
समान अधिकार प्रदान करने से जाहिर तौर पर शिक्षा सहित सामाजिक जीवन के सभी
क्षेत्रो में उनकी भागीदारी की स्थिति में सचमुच आमूल चुल बदलाव आया है हालांकी
एतिहासिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों की तुलना में समाज और शैक्षिक क्षेत्र
में इस वर्ग की समावेशिता का स्तर भिन्न रहा है
आदिवासी-आज की शिक्षा:-
जनगणना 2011 के आकड़े के आधार पर जनजातीय समुदाय की साक्षरता दर 58.96% है जबकि अन्य सामजिक वर्ग जिसकी साक्षरता दर 72.99% है अन्य सामजिक वर्ग और जनजातीय वर्ग के मध्य साक्षरता अंतराल 14.03% का है | जबकि जनजातीय समूह के विद्यार्थियों तक शिक्षा की पहुच या शिक्षा तक जनजातीय विद्यार्थियों की पहुच सके | प्राथमिक स्तर तक 11.00%, उच्च प्राथमिक स्तर तक 8.7%छात्र तथा माध्यमिक स्तर तक 6.4% ही छात्रो का नामांकन हुआ है या शिक्षा तक पहुच हुई है| वही सकल नामांकन अनुपात (जी इ आर ) 2010-2011 में सभी सामाजिक समूह का 119.8% है तथा वाही जनजातीय समूह का 86.5% है अगर जनजातीय समूह में उच्च शिक्षा में सकल नामंकन अनुपात की बात करे तो वह मात्र 10.5% ही है, जो निम्न स्तर है, जनजातीय समूह में बालिकायो तक शिक्षा की पहुच 100 बालको के अनुपात में मात्र 91बलिकयो तक ही है | ये विभिन्न आकड़े जनजातीय समूह में शिक्षा के स्तर और उनकी शिक्षा तक पहुच को प्रदर्शित करता है, जो उनकी वर्त्तमान शिक्षा की स्थिति को प्रदर्शित करते है,वाही जनजातीय समूह में अपव्यय एवम अवरोधन दोनों समस्याए विद्यमान है कक्षा 1 से 10 के मध्य तक 78.9% विद्यार्थी बीच में ही स्कुल को छोड़कर चले जाते |
जनजतीय शिक्षा के विकास संबंधी योजनाए-
(1) जनजातीय लडको एवम लडकियों हेतू छात्रावास–लडको के वेहतर आवासी
सुबिधा उपलब्ध कराने के उद्येश्य से 1989-90 में छात्रावास की शुरुआत की गई जबकि
लडकियों हेतू 2000-2001 के दौरान छात्रावास निर्माण का कार्य किया गया |
(2)आश्रम विद्यालय – यह
योजना 1990-91 में शुरू हुई थी इसमे जनजातीय बच्चो को शिक्षा देने की व्यवस्था की
गई
(3)जनजातीय क्षेत्रो
में व्यवसायिक प्रशिक्षण केंद्र – इस योजना का उद्देश्य विभिन्न पारम्परिक आधुनिक
व्यवसाय में उनके शैक्षिक योग्यता के अनुसार वर्तमान आर्थिक रुझानो तथा बाजार
क्षमता के आधार पर जनजातीयो के कौशल का उन्नयन करना है |
(4)जनजातीय लड़कियों के
बीच शिक्षा सुदृढ़करण – यह सरकार की जेंडर आधारित योजना है इस योजना का उद्देश्य
पहचाने गए जिलो एवम ब्लाको में जनजातीय लडकियों को 100% नामांकन की सुबिधा के
माध्यम से जनजातीय महिलायों के बीच शिक्षा स्तर के अंतर को समाप्त करना तथा शिक्षा
के अपेक्षित के परिवेश के सृजन द्वारा शिक्षा बीच में छोड़ने की दर को कम करना है |
शिक्षा का अधिकार अधिनियम एवम् आदिवासी शिक्षा-
भारतीय संबिधान के अनुच्छेद 21(क) में शिक्षा के अधिकार अधिनियम को 1 अप्रैल 2010 को जोड़ा गया, यह 6 से 14 वर्ष के बालको को निःशुल्क एवम अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है |शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागु हो जाने के पश्चात् जनजातीय समूह की शिक्षा में आमूल परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है खास जनजातीय समूह के बालको सकल नामांकन अनुपात प्रारंभिक शिक्षा में जो 119.81 है इस बात को परिणाम है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम प्रभावी होने के पश्चात् जनजातीय शिक्षा में वृद्धि हुई |
कल में आदिवासी शिक्षा-
कल में आदिवासी शिक्षा की बात की जाय तो वह वर्त्तमान के अन्धकार से निकल कर प्रकाश के मार्ग पर चल पड़ी है बस उसे सही रास्ते दिखाने की जरुरत है जिससे इस समाज की शैक्षिक स्थिति अच्छा से वेहतर हो सके | उपर्युक्त योजनाओ के प्रभावों एवम क्रियान्वयन का अध्यन के पश्चात् कहेगे की इन क्रियान्वित योजनाओ के माध्यम से जनजातीय शिक्षा में सुधार के अथक प्रयास जरी है जिसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते है वशरते इन योजनाओ का संचालन एवम् क्रियान्वयन सही तरीके से किया जाय और इनका प्रभाव धरातलीय स्तर पर उतर सके, जिससे इन योजनाओ का लाभ जनजातीय समूह को सीधे प्राप्त हो सके, क्योकि किसी भी चीज को ऊपर उठाने के लिए सही एवम् सार्थक प्रयासों की जरुरत होती है, इन आदिवासियों को जंगलो से निकल कर मुख्यधारा में जोड़ना ही हमारा मुख्य लक्ष्य होना चाहिए| आदिवासियों के पारम्परिक ज्ञान की तथा कथित मुख्य धारा के समाज द्वारा घोर उपेक्षा भी की जाती रही है यह तथा कथित मुख्यधारा का समाज आज के युग को विज्ञान का युग मानता है और आदिवासीयो के पारंपरिक ज्ञान विज्ञान एवम कलाओ को हेय दृष्टि से देखता है | आदिवासियों की कल शिक्षा के सम्बन्ध हम यही कहेगे कि इनकी शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण में सकारात्मका का विकास किया जाय साथ ही इन्हे शिक्षा प्राप्ति हेतू अधिक से अधिक प्रोत्साहित किया जाय, बच्चो को स्कूली शिक्षा जरी रखने और स्कूली पढाई छोड़ने से रोकने के लिए, सरकारों ,स्कुलो और समुदाय के लिए यह बहुत आवश्यक है कि वे जनजातीय बच्चो को भेदभाव रहित वातावरण उपलब्ध कराये यदि स्कुल इन बच्चो के अरुचिकर और प्रतिकूल स्थान बना रहेगा, तो ऐसे में स्कूली शिक्षा में इन बच्चो की समग्र शैक्षिक भागीदारी की दिशा में बहुत करना बाकि रह जायेगा | इसलिए अब जरूरत इस बात की है कि महज शिक्षा के प्राथमिक और बाद के स्तरों पर दाखिला लेने तक सीमित न रहकर उससे आगे बढ़ा जाय, जनजातीयो की लडकियों को साथ जोड़ने और उनकी स्कुल तक पहुच संभव बनाने के लिए विशेष प्रयास करना एक महत्वपूर्ण चुनौती है क्योकि अपने वर्ग के लडको की तुलना में ये लडकिया जनजाति, जेंडर और सामाजिक वर्ग के संदर्भ में दोगुना या तीनगुना ज्यादा सुबिधाहीन है | जिससे उनका शिक्षा से वहिष्क्रिप रहना और जयादा वढ जाता है | परिवर्तन की किसी की गयी प्रक्रिया को मिश्रित प्रयासों या जनजाति,जेंडर और अंतर-वर्गीयता पर सावधानी से गौर करना होगा ,जनजातीय लडको व लडकियों के लिए स्कुल ऐसा होना चाहिए जो उन्हें उनके ऐतिहासिक पूर्व्वृत्तो और किसी समुदाय बिशेष जन्म लेने की वजह से मिले अभावो से मुक्ति दिलाए स्कुल और समाज दोनों को न्ययोचित्त और निष्पक्ष रवैया अपनाने की आवश्यकता है ताकि भारतीय समाज सही मायनों में लोकतान्त्रिक समाज होने का दावा कर सके जहा सभी नागरिको से बराबरी का व्यवहार होता है|
निष्कर्ष-
वर्तमान समय में आदिवासी शिक्षा को हम वैसे ही परिभाषित कर सकते हैं जैसे श्री लाल शुक्ल ने शिक्षा को परिभाषित किया हैं, “ भारत में शिक्षा सड़क पर भटकती आवारा कुतिया है जिसे सब लतियाते है, परन्तु कोई उसका उपचार नहीं करता है |अब जरुरत इस बात की है कि महज शिक्षा के प्राथमिक और बाद के स्तरों पर दाखिला लेने तक सीमित न रहकर उनसे आगे बढ़ा जाय, स्कुल जैसे ही उल्लास और व्यापक रूप से सिखाने की जगह बने बनेगा, वः इन वर्गों के बच्चो को शिक्षा के उच्च स्तरों तक पहुचने में सहायक होगा, जिससे उनका शिक्षित श्रम बाजार में समावेश सुनिश्चित हो सकेगा वास्तव में जरूरत इस बात की है कि सरकार विशेषकर जनजातीय समूह के विद्यार्थीय पर विशेष फोकस कर सके जिससे उनमे शिक्षा के प्रति रुझान बढ़ सके जो उनके सामाजिक प्रक्रिया के हाशिये से निकल कर मुख्यधारा से जुड़े | प्रमुख शिक्षा शाष्त्री जान डीवी का कहना है कि व्यक्तित्व की श्रेष्ठता का सामाजिक दक्षता से विरोध सामन्तवादी व्यवस्था के आधार पर संगठित समाज की देन है जिसमे हीन और श्रेष्ठ के बीच कठोर बिभाजन होता है | मगर लोकतान्त्रिक समाज के सभी सदस्यों से यह उपेक्षा की जानी चाहिए कि वे समाज को कुछ दे और सभी को अपनी विशिष्ठ क्षमताओ का विकास करने का अवसर मिलाना चाहिए |

Comments
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें