राष्ट्रीय शिक्षा नीति ड्राफ्ट : 2016 एवं दिव्यांग
शिक्षा आज विश्व में अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया जब से मानव ने समाज में रहना आरंभ किया है, तभी से अब तक चलती आ रही है। वर्तमान समय में शिक्षा इन तीन अर्थों में समझी जाती है, अतः शिक्षा का अर्थ है-विद्यार्थी की छिपी हुई शक्तियों का विकास करना, उसे ज्ञान या प्रशिक्षण देना, उसके ज्ञान और नैतिकता को इस प्रकार विकसित करना जिससे कि वह अपने पर्यावरण और समाज में समायोजन कर सकें और मानव जीवन की सभी संभावनाओं को प्राप्त कर सकें।
आज के समाज में दिव्यांगो की शिक्षा महत्वपूर्ण है क्योंकि दिव्यांगता को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अभिशाप मानना सहानुभूति-दया आदि की भावना से ग्रसित होकर उनका सर्वागीण विकास सम्भव नहीं है स्टीफन हाकिंग महोदय ने दिव्यंगो के संदर्भ में कहा है कि “दिव्यांग लोगों को कई बाधाओं का सामना करने के कारण व्यावहारिक शारीरिक और वित्तीय रूप कमजोर पड़ना पड़ता है इन बाधाओं को दूर करना हमारी पहुच के भीतर है और ऐसा करना हमारा नैतिक कर्तव्य है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इन अवरोधों को समाप्त करना होगा इन सरे लोगों की क्षमता को खोला जाए जिससे ये दुनिया में अपना योगदान दे सके प्रत्येक सरकारे लाखो करोड़ो लोग जो अक्षमता से ग्रसित है उनकी अनदेखी नहीं कर सकती है इस वंचित समाज को स्वास्थ्य पुनर्वास समर्थन शिक्षा और रोजगार द्वारा कभी चमकाने का मौका नहीं मिला है” जब तक कि इनके बीच कार्य करने वाले व्यक्तियों, अध्यापकों एवं संचालित कार्यक्रमों का विकास इनके प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखकर न किया जाए। शिक्षक समाज के सजग प्रहरी, मार्गदर्शक एवं प्रकाश पुंज के रूप में कार्य करता है, इसलिए शिक्षक की भूमिका दिव्यांग विद्यार्थियों की शिक्षा में अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाती है।
दिव्यांग से तात्पर्य है, मानसिक-सामाजिक या मनोवैज्ञानिक, किसी भी क्षेत्र में हुई दिव्यांगता, बालक में जब सीखने-सिखाने की समस्या उत्पन्न कर देती है तो वे दिव्यांग कहलाते है। सामान्य रूप से दिव्यांग प्रकार में वे दिव्यांग भी आ जाते है जिन्हें विद्यालयी शिक्षा ग्रहण करने हेतु विशेष शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता होती है विशेष शिक्षा प्राप्त होने पर ही दिव्यांग अपनी शक्तियों का अधिकतम उपयोग कर सकता है।
दिव्यांगता को परिभाषित एवं वर्गीकृत करने में मानव सभ्यताओं ने समाज में कई प्रकार की व्यवस्थायें की हैं। विषेष रूप से भारत के सभ्य व संभ्रातसमाज में दिव्यांगता का विभेद कर व्यक्ति की शारीरिक अक्षमता के भावों में कुछ विषिष्ट सम्बोधन उन व्यक्तियों को दिये गये हैं। जैसे- अंधा, कांणा, लंगड़ा, लूला,गूंगा, बहरा, पागल, कोड़ी आदि सभ्य समाज द्वारा दिये गये विषिष्ट असभ्य सम्बोधन हैं जो दिव्यांग व्यक्तियों को प्रताड़ित करने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। किन्तु समाज में कुछ अन्य सम्बोधन भी दिव्यांग व्यक्तियों को दिये गये हैं जैसे- सूरदास, नैनसुख, पंगु,लंगु, मौनी इत्यादि।
सम्पूर्ण भारत में दिव्यंगो की जनसंख्या जनगणना 2011 के आधार पर 2.68 करोड़ है जो सम्पूर्ण जनसंख्या 121 करोड़ में 2.21 प्रतिशत है जिनमें दृष्टि बाधित 19 प्रतिशत श्रवण ह्रास 19 प्रतिशत वाक् बाधित 7 प्रतिशत क्रिया आधारित दिव्यांग 20 प्रतिशत मानसिक मंद 6 प्रतिशत, मानसिक बीमार 3 प्रतिशत, बहु दिव्यांग 18 प्रतिशत तथा अन्य प्रकार के दिव्यांग की जनसख्या 18 प्रतिशत है जिसमें से ग्रामीण क्षेत्रो में 69 प्रतिशत तथा शहरी क्षेत्रो में 31 प्रतिशत दिव्यांग निवास करते है
दिव्यंगो की साक्षरता स्थिति भारत की साक्षरता दर 73 प्रतिशत के सापेक्ष में मात्र 55 प्रतिशत (1.46करोड़) है जिसमेसें 62 प्रतिशत पुरुष साक्षरता दर एवं 45 प्रतिशत महिला साक्षरता दर राष्ट्रीय साक्षरता दर के अनुपात में निम्नतम स्थिति है जो इनकी दयनीय शैक्षिक स्थिति को इंगित करता है स्कूल तक पहुच की बात करे तो 5 से 19 वर्ष के सम्पूर्ण दिव्यंगो में सें मात्र 57 प्रतिशत बालक एवं 47 प्रतिशत बालिका तक हो पाई है सम्पूर्ण दिव्यांग जनसँख्या 2.68 करोड़ में सें 11 प्रतिशत प्राथमिक से नीचे शिक्षा प्राप्त, 12 प्रतिशत प्राथमिक तक शिक्षा प्राप्त, 9 प्रतिशत माध्यमिक तक शिक्षा प्राप्त तथा मात्र 3 प्रतिशत दिव्यांगो की स्नातक शिक्षा तक पहुच है (जन गणना 2011 के अनुसार) ये आकड़े हमें ये इंगित करते है की यह समाज आज भी शैक्षिक रूप से मुख्य समाज से काफी पिछड़ा हुआ है
किसी भी समाज की उन्नति में शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कराती है भारत जैसे लोकतंत्रीय देश में शिक्षा की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है जैसा की इमाइल दुर्खिम ने कहा है कि ‘शिक्षा वह साधन है जिसके द्वारा समाज बालको में अपने अस्तित्व की अनिवार्य अवस्था को तैयार करता है’ शिक्षा और समाज एक दुसरे से इस प्रकार सम्बन्धित है कि कहा जायेगा कि ये दोनों एक सिक्के दो पहलू है
भारत ने दिव्यंगो के अधिकारों से संबंधित कई अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्रों एवं संधियों पर हस्ताक्षर किए हैं एवं दिव्यंगो के अधिकार संबंधी संयुक्त राष्ट्र समझौते पर भारत ने 2006 में हस्ताक्षर किया और उसे स्वीकार किया। यूएनसीआरपीडी का अनुच्छेद 24 विशेष रूप से शिक्षा की बात करता है तथा सरकारों को दो काम करने के लिए बाध्य करता है
- दिव्यांग बच्चों, युवाओं को अन्य बच्चों के समान शिक्षा मुहैया कराना
- ऐसी शिक्षा समावेशी व्यवस्था में प्रदान करना
क्या राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2016 भारत में दिव्यांग बच्चों के समावेशन का परिदृश्य बदलने में सक्षम है?
शिक्षा पर समग्र नीति मूलतः राजनीतिक इच्छाशक्ति एवं राजनीतिक दृष्टि को कार्य में बदलने का मार्ग तलाशने का प्रयास है। हमारे समाज के वंचित वर्ग को शिक्षा एवं विकास की मुख्यधारा में लाना ऐसी प्रक्रिया है, जिस के लिए समावेशन की राह में आने वाले सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक-
प्रशासनिक एवं अन्य प्रकार की बाधाओं को पहचानने तथा व्यवस्थित तरीके से दूर करने की आवश्यकता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2016 में समावेशी शिक्षा की व्यापक समझ दिखती है। भारतीय संदर्भ में समावेशी शिक्षा में अनुसूचित जाति/जनजाति/अल्पसंख्यकों/दिव्यांग बच्चों एवं युवाओं और अत्यंत गरीबी तथा कठिन/ चुनौतीपूर्ण स्थितियों में रह रहे बच्चों की विविध आवश्यकताओं को शामिल करना होगा। भारत में पहली बार राष्ट्रीय शिक्षा नीति में समावेशी शिक्षा का भारतीय दृष्टिकोण शामिल किया गया है, जिसमें वैश्विक चिंताएं तथा प्रतिबद्वताएं झलकती हैं, जिनमें भारत प्रतिभागी है अथवा जिन पर उसने हस्ताक्षर किए हैं।
- नीतियां इस बात को नजरअंदाज करती हैं कि दिव्यांग बच्चों एवं युवाओं को शैक्षिक मुख्यधारा में शामिल किए बगैर सभी के लिए शिक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता है
- सभी के लिए शिक्षा में प्रगति पर नजर रखने वाला ढांचा दिव्यांग बच्चों एवं युवाओं को अनदेखा करता है
- योजना, प्रशासन, निगरानी एवं क्रियान्वयन के स्तरों पर समावेशी शिक्षा की राह में मौजूद व्यवस्थागत बाधाओं को पहचानने एवं दूर करने में असपफलता
- यह स्वीकार नहीं करना कि समावेशी शिक्षा पर प्रभाव डालने वाले कारक उन सामाजिक अंतरों में ही निहित हैं, जो अनुसूचित जाति/जनजाति/अल्पसंख्यक वर्गों के दिव्यांग बच्चों तथा युवाओं की शिक्षा में होते हैं एवं इन वर्गों के बच्चों के बीच भेद के रूप में होते हैं।
- दिव्यांगता राज्य/पीआरआई का विषय है और शिक्षा समवर्ती विषय है, जिस कारण भारत के विभिन्न राज्यों में दिव्यंग बच्चों/युवाओं को शिक्षा प्रदान करने में कठिनाई होती है।
दिव्यांग बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराना दो मंत्रालयों की जिम्मेदारी है। समावेशी शिक्षा मानव संसाधन विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी है तथा विशेष शिक्षा सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की जिम्मेदारी है। राज्य स्तर पर भी ऐसी तालमेल भरी भूमिकाएं हैं। इस कारण दिव्याग बच्चों की शिक्षा में विरोधाभासी नीतियां तथा चलन दिखते हैं। दिव्यांग बच्चों को कम आयु में ही शिक्षा प्रदान करने की भारत में कोई नीति नहीं है। आरंभिक बाल्यकाल में देखभाल एवं विकास के सबसे बड़े कार्यक्रम एकीकृत बाल विकास सेवा ;आईसीडीएसद्ध में आंगनवाड़ी केद्रों को एकीकृत आरंभिक बाल्यकाल विकास केद्रों के रूप में कार्य करने हेतु विकसित किया जाना अभी बाकी है।
दिव्यंाग महिलाओं/कन्याओं के लिए हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियों के अनुरूप पुनर्वास रणनीतियों की आवश्यकता है। हमें दिव्याग महिलाओं के अधिकारों एवं आवश्यकताओं के संदर्भ में व्यापक जागरूकता लाने की आवश्यकता है क्योंकि इस आधुनिक जगत में उन पर अधिक मार पड़ती है, जहां महिला के मूल्य को समझकर उसका सम्मान नहीं किया जाता
राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०१६ में दिव्याग के लिए किये गए प्रावधान:
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2016 में नीचे से ऊपर बढ़ने की नीति अपनाई गई है, जिससे समुदाय की चर्चा/बहस, प्रतिभागिता आरंभ होती है। इस नीति की यह अनूठी विशेषता है समावेशी शिक्षा पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2016 इस प्रयास में सफल है। हम देखते हैं कि इस प्रारूप में समावेशी शिक्षा पर वैचारिक स्पष्टता साफ बताई गई है। उदाहरण के लिए समावेशी शिक्षा को दिव्यांग बच्चों के लिए अलग रणनीति के रूप में देखने के बजाए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2016 इसे शिक्षा व्यवस्था का अभिन्न अंग मानती है और प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक दिव्यांग बच्चों/युवाओं की विविध आवश्यकताओं को मोटे तौर पर समझती है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2016 ने शिक्षा व्यवस्था के सभी अंगों में विकलांगता को शामिल किया है चाहे शिक्षा में प्रवेश हो, प्रवेश नीतियां हों, शिक्षकों का प्रशिक्षण हो, पाठ्यक्रम का विकास हो, शिक्षण की रणनीतियां हों, पठन सामग्री हो, मूल्यांकन व्यवस्था हो, आभासी शिक्षा माध्यम हों। राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०१६ में दिव्यंगो को व्यवसायिक एवं तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाएगी जिससे दिव्यांगो को व्यवसाय एवं तकनीकी रूप से दक्ष बनाया जा सके जिससे रोजगार प्राप्त करने में इनको सुबिध हो
- इसमें समावेशी नीति के मामले में दिव्यांगता के बजाए शिक्षा का दृष्टिकोण अपनाया गया है। यह नीति दिव्यांग बच्चों को अलग-थलग करने के प्रचलन को समाप्त करती है। यह प्रत्येक बच्चे के लिए ऐसे सक्षम तथा सहयोगी वातावरण में शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करने हेतु समावेशी दृष्टिकोण एवं लक्ष्यों को विशिष्ट, दिखाई देने वाले, मापने योग्य एवं प्राप्त करने योग्य कदमों से जोड़ती है, जिस वातावरण में बच्चों से दिव्यांगता अथवा लैंगिक आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०१६ में अनेक किये गए प्रावधानों के उपरांत कुछ बिंदु छूट गए है जो निम्न लिखित है जिन पर अमल किये जाने की जरुरत है
- दिव्यांगो की शिक्षा में व्याप्त अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या को समाप्त किया जाए इसे समाप्त करने हेतू यह सुनिश्चित किया जाऐ कि प्रत्येक दिव्यांग आर्थिक सामाजिक एवं पारिवारिक कारणों से स्कूल न छोड़े
- दिव्यांग बच्चो को गुणवत्ता युक्त समावेशी शिक्षा उपलब्ध करने के लिए नवोदय विद्यालयों की तर्ज पर प्रत्येक जिलो में सम्भव न हो तो प्रत्येक मंडल में एक आवासीय समावेशी माडल स्कूल की स्थापना की जाए
- इस शिक्षा नीति में सुनिश्चित किया जाए कि प्रत्येक दिव्यांग बच्चे की कम से कम स्नातक तक शिक्षा निः शुल्क एवं अनिवार्य किया जाए जो दिव्यांग बच्चो के लिए एकीकृत योजना (आईसीडीएस) के अंतर्गत न्यूनतम 15 से 18 वर्ष तक निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा से आगे का प्रावधान करेगा
इस शिक्षा नीति के द्वारा यह सुनिश्चित किया जाए कि दिव्यांगता जो राज्य ध्पीआरईआई का विषय है उसे राज्य सूचि ने निकल कर समवर्ती सूचि में शिक्षा के साथ जोड़ा जाए जिससे दो मन्त्रालयो एवं राज्य सरकारों एवं केन्द्र के बीच विरोधाभास् की स्थिति समाप्त हो जाए
निष्कर्ष :
हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था की आशा करनी चाहिए एवं उसके लिए कार्य करना चाहिए, जिसके दरवाजे सभी दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए खुले हों और उनके लिए अनुकूल वातावरण हो। लचीली शिक्षा व्यवस्था, ई-लर्निंग सुविधाएं, प्रस्तावित स्वयं ऑनलाइन शिक्षण, समावेशी शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम, राष्ट्रीय कौशल विकास कार्यक्रम, सभी वर्तमान शिक्षकों में क्षमता निर्माण तथा अन्य उपायों से सभी के लिए शिक्षा भारत में यथार्थ बन जाएगी।
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