भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण के सामान्य सिद्धांत तथा भाषा सिखाने पर तकनीकी का प्रभाव
प्रस्तावना:
भाषा को हमेशा अभिव्यक्ति का माध्यम भर मान लिया जाता है सदैव इसी के अनुरूप भाषा की कक्षाओं की शिक्षण प्रक्रिया
भी संचालित होती है जहाँ भाषा को केवल एक विषय के रूप में शिक्षण
किया जाता है। पाठ्यपुस्तक माध्यम की बजाय साध्य बनकर रह जाती है और सारा ध्यान भाषा सीखने की बजाय पाठ के पीछे के अभ्यास हल करने तथा उच्चारण और लिपि की शुद्धता तक ही
भाषा सिखाने का उद्देश्य सीमित होकर रह जाता है।
भाषा इन्सान, संस्कृति व समाज की रचना व उसके विकास की बुनियाद होती है। यह भी है कि भाषा इन सभी से अलग नहीं है और इन सबमें गुँथी हुई है। इन सबके संदर्भ अलग भी हो सकते हैं, किन्तु ये आपस में गुँथे हुए है। भाषा के बगैर हम न इंसान और न ही समाज और संस्कृति की कोई
चर्चा को आगे बढ़ा सकते हैं। जब भी भाषा की चर्चा होगी तो इंसान, समाज,
संस्कृति की भी बात होगी। दूसरे शब्दों में कहे तो भाषा समाज और संस्कृति का गठन भी करती है और स्वयं भी इससे संगठित होती है। विद्वानों का मानना है कि भाषा न केवल मानव विचारों के विकास का आधार है बल्कि मानव विचारों के अस्तित्व का भी आधार है। भाषा के बगैर मानवीय चिंतन की कल्पना नहीं की जा सकती है।
यद्यपि हम शिक्षा के संदर्भ में चर्चा
करे तो यह हर स्तर पर भाषा केन्द्रीय होती है। विचार करना, अपने विचारों को शब्द प्रदान
करना, उन्हें अलग-अलग तरह से विकसित करना जिसके लिए भाषा सबसे जरूरी माध्यम होती है। इसके पर्याप्त प्रमाण हैं कि बच्चे अपनी भाषा (वह भाषा जो उन्होंने अपने घर में, अपने परिवेश में रहते हुए अर्जित करते है) में हर तरह के विचार-विमर्श की क्षमता होती हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि भाषा ही बच्चें में अवधारणाओं की पुख्ता समझ और बेहतर चिंतन करने की
क्षमता विकसित करते हैं। उनकी खुद की भाषा में व संस्कृति के संदर्भ में रचित शिक्षण प्रक्रिया द्वारा उनमें सीखने के लिए आवश्यक आत्मविश्वास विकसित किया जा सकता है।
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एन.सी.एफ.), 2005 और 'भारतीय भाषाओं का शिक्षण' पोजीशन पेपर इन सबके बारे में एक दृष्टि प्रदान
करता हैं। इन्हीं के आधार पर भाषा सिखाने के पाठ्यक्रमों, पढ़ाने के ढंग, पाठ्यपुस्तकों व अन्य पुस्तकों की रचना व उनकी कक्षा में जगह, शिक्षकों की तैयारी, आकलन के तरीकों आदि की रचना की जाती है। भारत के बहुभाषी परिदृश्य में लोकतान्त्रिक समावेशी शिक्षा के लिए भाषा, संस्कृति, समाज के शिक्षा के अन्तःसम्बन्ध एक खास सरोकार रखते हैं जिन्हें गहराई से समझना जरूरी है। एवं इस दिशा में काम
किया जाना चाहिए|
भाषा-शिक्षण का मुद्दा विद्यालयी शिक्षा के हर स्तर और एकाधिक पहलुओं से जुड़ा हुआ है। मसलन अगर प्राथमिक कक्षा में हमारा भाषा-शिक्षण अपने लक्ष्यों को पूरा करने में सक्षम होता है और विद्यार्थी प्राथमिक कक्षाओं से निकलकर स्वतंत्र ढंग से पढ़ना और लिखना सीख लेते हैं तो आखिर उच्च-प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर अलग से भाषा की कक्षा की आवश्यकता क्यों होती है। मान लें कि विद्यार्थी के घर की भाषा हिन्दी या उर्दू है और उसने सहज ढंग से सामाजीकरण के दौरान ये भाषाएँ अर्जित कर लीं हैं। तत्पश्चात स्कूल आकर उसने इन भाषाओं में स्वतंत्र ढंग से लिखना और पढ़ना प्राथमिक कक्षाओं में सीख लिया है, फिर इसके बाद उच्च-प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर उसे हिन्दी या उर्दू क्यों पढ़ना चाहिए? अब आगे वह स्कूल में इन भाषाओं में ऐसी कौन-सी दक्षताएँ अर्जित करेगा जो वह सामान्य जीवन में इन भाषाओं को बरतते हुए अर्जित नहीं कर सकता? शिक्षाक्रम, पाठ्यपुस्तक लेखन से जुड़े शिक्षविदों और भाषा-शिक्षकों के पास इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर होने चाहिए। जिससे हम अपनी
नीतियों में विशेषतः भाषा शिक्षण से जुड़े मुद्दों को हल कर सके, क्योकि हम देखते
बच्चा बचपन के दिनों में ही एक भाषा सीख लेता है जिसे हम मातृभाषा के नाम से जानते
है अपनी मातृभाषा को सीखने में बच्चे को न किसी प्रकार के औपचारिक शिक्षण की जरुरत
हुई है| विद्यालयी शिक्षा, खासकर प्राथमिक-शिक्षा की यह आम समझ है। शिक्षित व्यक्ति को आम बोलचाल में 'पढ़ा-लिखा' व्यक्ति कहा जाता है। लिखी हुई भाषा को पढ़ पाना और अपने विचारों और भावनाओं को लिखकर व्यक्त कर पाना- इन बुनियादी क्षमताओं के आधार पर ही आम लोग किसी भी व्यक्ति को ‘पढ़ा-लिखा’ या शिक्षित मानते हैं। इन अपेक्षाओं के अतिरिक्त शिक्षित व्यक्ति से कुछ नैतिक और बौद्धिक अपेक्षाएँ भी होती हैं, लेकिन पढ़ने-लिखने की काबिलियत को लगभग बिना किसी विवाद के आम लोग शिक्षित व्यक्ति की बुनियादी काबिलियत मानते हैं। जाहिर है जब विद्यालयी तंत्र बड़ी सँख्या में अपने विद्यार्थियों में ये बुनियादी क्षमताएँ विकसित नहीं कर पाता है तो उस तंत्र की विश्वसनीयता ही संकट में पड़ जाती है। वर्त्तमान समय में हमारा विद्यालयी शिक्षा तंत्र कुछ ऐसे ही सवालों के संकट से गुजर रहा है। नीति-निर्माताओं के बीच सीखने के जिस संकट की चर्चा है उस संकट का एक सिरा विद्यालयी तंत्र की इस असफलता से जुड़ा है। मुश्किल यह है कि पिछले अनेक वर्षों से इस संकट को रेखांकित तो किया जा रहा है, लेकिन इसे समझने की बहुत व्यवस्थित कोशिश नहीं हो रही है। समझ की सीमा यह है कि पढ़ना-लिखना सीखने और सिखाने की एक यांत्रिक समझ हमारे सहज बोध में व्याप्त है। इसे आम तौर पर तकनीकी समस्या के रूप में देखा जाता है और उसका समाधान भी तकनीकी स्तर पर ही पेश किया जाता है, और प्रकट तौर पर यह किसी जटिल स्तर की तकनीकी चुनौती भी पेश करती हुई नजर नहीं आती। साफ तौर पर लोगों को दिखता है कि पढ़ना-लिखना सिखाना कोई रॉकेट साइन्स नहीं है। कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति किसी भी निरक्षर व्यक्ति को साक्षर बना सकता है। जब ऐसे तकनीकी समाधान देने में हम असफल होते हैं तब झुंझलाहट और बढ़ जाती है।
भाषा का अर्थ समझना?
प्राय:शिक्षक ‘भाषा क्या
है?’ का अर्थ बहुत सीमित अर्थों में समझते हैं। यह पूछे जाने पर कि भाषा से आप का
क्या अर्थ है जवाब होता है - भाषा यानी विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम अर्थात् ‘सम्प्रेषण का साधन’। इस बात पर कभी गौर नहीं किया जाता कि जिन विचारों को सम्प्रेषित करना है वे
विचार कहाँ से व कैसे आते हैं? दूसरे शब्दों में क्या भाषा के बगैर हम सोच सकते हैं? कल्पना
एवं चिंतन कर सकते हैं? चीजों को अलग-अलग संबोधित
कर सकते हैं, उनका वर्गीकरण कर सकते हैं? विश्लेषण
एवं संश्लेषण कर सकते हैं? हम भाषा का उपयोग कहाँ-कहाँ एवं कब-कब करते हैं? कैसे करते हैं? एवं
क्यों करते है? हमारा व भाषा का सम्बन्ध
क्या होता है? यदि इन पहलुओं के बारे में गहराई से सोचा जाए तो यह सूची और लम्बी होती चली
जाती है। उदाहरण के लिए यदि किसी नए व्यक्ति से मिलते हैं, उससे
चार पांच मिनट बात करने के दौरान ही हमें पता चल जाता है कि फला
व्यक्ति पंजाबी है, बंगाली अथवा गुजराती....। यानी इंसान के व्यक्ति, उसकी पहचान, उसकी क्षमताओं का विकास इत्यादि सभी बातें भाषा से सम्बंधित
होती हैं।
इसका तात्पर्य यह है कि हममें से अधिकांश लोग जो मानते हैं कि भाषा यानी ‘सम्प्रेषण का माध्यम', कुछ हद तक ही ठीक है। जाने माने शिक्षाविद् कृष्णकुमार ने अपनी पुस्तक ‘बच्चों की भाषा और अध्यापक’ में कहा है: ‘हममें से कई लोग भाषा को सम्प्रेषण
का साधन मानने के इतने ज्यादा आदी हो चुके हैं कि हम सोचने, महसूस करने और चीजों से जुड़ने के साधन के रूप में भाषा की उपयोगिता को अक्सर कबूल
नहीं करते हैं। भाषा के उपयोग का यह बड़ा दायरा उन लोगों के लिए बेहद
महत्वपूर्ण है जो छोटे बच्चों के साथ काम करना चाहते हैं। लेकिन भाषा का यह सीमित अर्थ भी कक्षा तक आते-आते कहीं गुम हो जाता है और उसे एक ऐसे विषय के रूप में पढ़ाया जाता है जिसके द्वारा बच्चों को नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी जा सके।‘
भाषा की कक्षा सिर्फ वर्ण, शब्द, वाक्य बोलना, पढ़ना, लिखना सिखाने पर
केवल केन्द्रित होकर रह जाती है। न तो उसमें कविताओं व कहानियों के लिए कोई स्थान होता है न बच्चों को बातचीत के मौके प्रदान
किये जाते हैं और न अपनी बात को अभिव्यक्त करने के। चाहे वह मन से लिखना हो अथवा कहना।
इन्ही समस्याओं की वजह से भाषा की कक्षा नीरस एवं उबाऊ हो जाती है| जबकि भाषा के
संदर्भ में कहा जाता है कि भाषा बच्चों को कल्पना करने की क्षमता प्रदान कराती है| शिक्षक भाषा को एक समग्र रूप में देखने की बजाय टुकड़ों-टुकड़ों में देखते हैं। वे मानते हैं कि भाषा टुकड़ों-टुकड़ों को जोड़कर सीखी जाती है। चाहे ये टुकड़े फिर सुनने, बोलने, पढ़ने, लिखने के हों अथवा अक्षर, मात्रा, शब्द व वाक्य। यदि हम फिर से उद्देश्यों पर जाएँ और उनका गहराई से विश्लेषण करें तो उनमें भी यह विभाजन साफ-साफ दिखाई देता है, जैसे
●
पहले बच्चों को ध्वनियों का उच्चारण
करना सिखाना है।
●
फिर साफ व स्पष्ट बोलना
●
उसके बाद अक्षर व वर्ण पढ़ना और अंत
में लिखना।
शिक्षकों के अनुसार भाषा सिखाने का तात्पर्य है; सुनना, बोलना, पढ़ने व लिखने का कौशल का विकास करना
मात्र है जबकि ऐसा नहीं भाषा संप्रेषण का माध्यम जरुर होती है किन्तु सम्प्रेषण कर
लेने की क्षमता पा जाने मात्र से भाषा के उद्देश्य नहीं पुरे हो जाते है|
शिक्षकों
के अनुसार भाषा सम्बन्धी कौशलों के विकास की प्रक्रिया कुछ ऐसी होती है: यद्यपि बच्चा अपने आसपास हो रही बातचीत को सुनता रहता है लेकिन भाषा वह माँ से ही सीखता है। माँ बार-बार बच्चे को सुनाने के लिए बोलती है, जैसे - बोलो ‘माँ’, ‘माँ’ और बार-बार भी ध्वनी से परिचय होने के फलस्वरूप बच्चा ‘माँ’ शब्द सीख जाता है और ‘माँ’ बोलना शुरू करता है। इसी तरह उसको अन्य ध्वनियों से परिचय करवाया जाता है। और फिर वह ये शब्द भी बोलने लगता है। ये शब्द छोटे व सरल होते हैं अत: बच्चा जल्दी सीख जाता है। फिर बारी आती है लम्बे व कठिन शब्दों व वाक्यों की। माता-पिता व रिश्तेदार बार-बार इन शब्दों को बच्चें के सामने दोहराते हैं। इसी तरह बच्चा शब्द व वाक्य बोलना सीख जाता है। शिक्षकों का यह दृढ़ विश्वाश होता है कि बच्चा बगैर सुने नए शब्द व वाक्य बोल ही नहीं सकता। यानी पहले सुनने की प्रक्रिया होगी फिर बोलने की।
यद्यपि हम भाषा के संदर्भ में देखे तो पायेगे की सुनना एवं बोलना ये दोनों
प्रक्रिया साथ-साथ होती है, यद्यपि यह देखा गया है की बाल्यावस्था में बच्चे
ज्यादातर शब्दों को दोहराव द्वारा ही सिखाते है किन्तु केवल परिवार के लोगो के
द्वारा बोले गए शब्दों को दोहराते है सही नहीं है बल्कि बच्चे जानवरों की ध्वनिय
सुनकर भी दुहराने का काम करते है जैसे किसी बच्चे आप पुच्चे की बिल्ली कैसे बोलती
है तो बच्चा तुरंत बिल्ली जैसी ध्वनी निकलकर सुना देगा
पढ़ने व लिखने की प्रक्रिया भी कुछ इस तरह ही होती है। पढ़ने का मतलब होता है अक्षरों को पहचानना और ध्वनियों का उच्चारण कर पाना। और इसीलिए बच्चे पढ़ने के नाम पर वर्णमाला को रटते रहते हैं, कविताओं व कहानियों को शब्दश: दोहराते रहते हैं। लिखना भी एक स्वतन्त्र कौशल की तरह मशीनी ढंग से सिखाया जाता है। बच्चों को अक्षरों की नकल के लिए कहा जाता है। शब्दों की नकल करवाई जाती है। सोचें, कि यदि हमें किसी एक ही काम को बार-बार करने को दिया जाए तो कैसा महसूस करेंगे। लेकिन शुरुआती एक साल में भाषा-शिक्षण के नाम पर बच्चे यही कवायद करते रहते हैं। इन चारों कौशलों को अलग-अलग देखने की वजह से ही शिक्षण प्रक्रिया बोझिल उबाऊ व बार-बार रटने वाली हो जाती है। जैसे यह सब एक-दूसरे से अलग-अलग प्रक्रियाएँ हों। इसी तरह क्या अक्षर व शब्दों को पढ़ना-सीखना लिखने की प्रक्रिया में कोई योगदान नहीं देता? इन प्रश्नों के बारे में कोई विचार नहीं करता। यदि पढ़ना व लिखना बच्चों के अनुभव व बातचीत से शुरू होगा तो वह बच्चों के लिए अर्थपूर्ण होगा।
भाषा
का अपना संसार:
एक और महत्वपूर्ण मसला है भाषा व बोली का। जिस भी मंच पर भाषा-शिक्षण की बात होती है, यह मसला जरूर उठता है। शिक्षक बच्चों द्वारा बोली जाने वाली भाषा को दूसरे दर्जे की समझते हैं क्योंकि उनका मानना है कि भाषा तो वह होती है जिसका अपना साहित्य व व्याकरण होता है, उसकी लिपि होती है, वह मानकीकृत व शुद्ध होती है। बच्चे जो भाषा अपने घर से लेकर आते हैं वह तो भाषा नहीं है क्योंकि वह तो एक क्षेत्र विशेष के लोगों द्वारा बोली जाती है, उसका न तो साहित्य है न व्याकरण न लिपि।
अत: स्कूल के पहले दिन से ही बच्चों को मानकीकृत और शुद्ध भाषा सिखाने का प्रयास किया जाता है। और यदि बच्चे अपनी घरेलू भाषा का प्रयोग विद्यालय में करते हैं तो उन्हें डाँट दिया जाता है। बच्चे यह समझ नहीं पाते कि उन्हें क्यों डाँटा जा रहा है ?
घर में आसपास परिवेश में हर कहीं वही भाषा बोली जाती है पर स्कूल में अध्यापक के सामने जब वे बोलते हैं तो गलत क्यों हो जाते हैं। बात यहीं खत्म नहीं होती। जैसे कि हमने पहले भी बात की। भाषा व्यक्ति की संस्कृति व पहचान होती है। बच्चे द्वारा अपनी घरेलू भाषा का उपयोग न करने देना उसकी पहचान व संस्कृति पर सीधा प्रहार है। बार-बार डाँट खाने के कारण जो बच्चे इतनी बातचीत करते हैं, धीरे-धीरे बात करना ही बन्द कर देते हैं।
यदि भाषा-विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो भाषा व बोली में कोई फर्क नहीं होता। भाषा का भी व्याकरण होता है, बोली का भी। यह बात जरूर है कि वह व्याकरण लिखित रूप में उपलब्ध नहीं होता। पर इसका तात्पर्य यह नहीं है कि व्याकरण होता ही नहीं। यही बात साहित्य पर भी लागू होती है। हो सकता है कि कई बोलियों (भाषाओं) में लिखित साहित्य न हो लेकिन मौखिक साहित्य जरूर होता है। दूसरा भोजपुरी, अवधी, मैथिली जिन्हें हम बोलियाँ कहते हैं उनमें तो बहुत साहित्य उपलब्ध है। भाषा का क्षेत्र विस्तृत है अथवा बोली का? - यह आप सोचिए कि हिन्दी भाषी लोग ज्यादा हैं अथवा भोजपुरी। और जो भी लोग हिन्दी बोलते हैं वे कितनी शुद्ध हिन्दी बोलते हैं। और रही लिपि वाली बात तो दुनिया की किसी भी भाषा को किसी भी लिपि में लिख सकते हैं उदाहरण के लिए-
राम घर जाता है
हिन्दी भाषा को आप रोमन लिपि में लिख सकते हैं। और आजकल तो मोबाइल, कम्प्यूटर सभी पर हम यही करते हैं। अँग्रेजी भाषा को आप देवनागरी में लिख सकते हैं।
राम इज़ गोइंग
अध्यापक यह मानते हैं कि एक भाषा दूसरी भाषा सीखने में बाधक होती है। उदाहरणार्थ यदि बच्चा मेवाड़ी (क्षेत्रीय भाषा) जानता है तो उसका नकारात्मक प्रभाव उसके हिन्दी (मानकीकृत भाषा) सीखने पर पड़ेगा। लेकिन होता इसका उल्टा है। भाषा शिक्षा के द्वारा हम बच्चे की जिन क्षमताओं को विकसित करना चाहते हैं यथा सोचने-विचारने, अपनी बात कहने, तर्क करने, विश्लेषण करने वो तो उनकी अपनी भाषा में आसानी से विकसित हो सकती है और फिर यह कौशल दूसरी भाषा में स्थानान्तरित किया जा सकता है। रही उच्चारण व मानकीकृत भाषा की बात तो उपयुक्त सन्दर्भ व वातावरण मिलने पर बच्चे स्वयं ही धीरे-धीरे यह सब सीख जाते हैं।
भाषा
दोहराव से सीखी जाती है
शिक्षकों की एक और मान्यता है कि बच्चे भाषा तब सीखते हैं जब उन्हें वह भाषा सिखाई जाती है। ऐसी कक्षा का एक उदाहरण देखिए:
कक्षा-एक में बच्चे बैठे हुए हैं। प्रथम कालाँश लगता है। शिक्षिका कक्षा में आती है व कुर्सी पर बैठ जाती है। थोड़ी देर बाद बच्चों से कहती है चलो अपनी-अपनी स्लेट या कॉपी लेकर मेरे पास आओ। हम हिन्दी पढ़ेंगे।
बच्चे एक-एक करके अपनी स्लेट या कॉपी लेकर उनके पास जाते हैं। वह बच्चे की स्लेट पर 3-4 कॉलम बनाती हैं व एक कोने में ‘अ’ लिखकर बच्चे से कहती हैं ऐसे ही और बनाओ। इसी तरह वह कक्षा के सभी बच्चों को एक-एक वर्ण लिखने को देती हैं, जब बच्चे दिए गए वर्ण को लिख लेते हैं तो वह दूसरा वर्ण लिखने को देती हैं। इसी तरह कक्षा में कार्य चलता रहता है।
इस पूरे समय में एक बार कुछ ऐसा हुआ जो हटकर था। वह था बार-बार शिक्षिका द्वारा वर्ण लिखकर लाने को कहने पर एक बच्चे ने उनसे कहा मुझे नहीं लिखना है। कुछ और कराओ। लेकिन शिक्षिका के पास कुछ और कराने को नहीं था। अत: उन्होंने एक नया वर्ण फिर से बच्चे को लिखने के लिए दे दिया।
अब इस बात पर गौर करें कि भाषा सीखने की प्रक्रिया के दौरान बच्चे तुतलाते हैं। क्या हम उन्हें तुतलाना सिखाते हैं? वयस्क तो तुतलाकर बोलते नहीं ताकि बच्चों को उनकी नकल करने का मौका मिले व बच्चे वैसा बोलना सीखें। बच्चे नित नए शब्द व वाक्य बनाते हैं क्या हम प्रत्येक वाक्य को उनके सामने बोलते हैं? ताकि वे उसकी नकल कर सकें और सीख सकें। क्या हम कभी बच्चे को बोलते हैं, ‘पापा मुझे मोटरसाइकिल पर घूमने जाना है।’
‘पापा चॉकलेट खानी है।’
एक बच्ची व वयस्क की बातचीत का उदाहरण देखिए:
मेरे दोस्त की बच्ची (तीन साल) व उसकी बुआ बातचीत कर रहे थे।
बुआ: बोलो, मैं अच्छी हूँ।
बच्ची : मैं अच्छी हूँ ।
बुआ: मैं लड़की हूँ ।
बच्ची : मैं लड़की हूँ ।
बुआ: मैं गन्दी हूँ ।
बच्ची : आप गन्दी हो।
अब आप ही सोचिए। इस बच्ची को कैसे पता चला कि उसे अपने-आप को गन्दा नहीं कहने के लिए वाक्य में कहाँ व क्या-क्या परिवर्तन करने होंगे? वह यह कहना कैसे सीखी होगी नकल से अथवा आपके बताने से अथवा.... ?
भाषा सिखाने का एकमात्र साधन पाठ्यपुस्तक नही है !
बच्चों को सिर्फ पाठ्यपुस्तक में दी गई विभिन्न रचनाओं को पढ़ना है और वह भी दिए गए क्रम में यानी पहले अध्याय एक की, फिर दो.. तीन। बच्चे अपनी इच्छा से चुनकर पाठ भी नहीं पढ़ सकते। पाठ पढ़ने के बाद होता है उसके पीछे दिए गए प्रश्नों के उत्तरों को याद करना।
बच्चों के इर्द-गिर्द भाषाई सन्दर्भ उपलब्ध हैं। उदाहरण के तौर पर पत्रिकाओं, अखबारों, विज्ञापनों में, सड़कों पर लिखे गए विभिन्न निर्देश इत्यादि। इनमें कई जगहों पर भाषा का प्रयोग होता है लेकिन इन पर किसी का ध्यान नहीं जाता।
इसके बाद आती है साहित्य की बात। भाषा के वृहद् साहित्य विशेषकर बच्चों की उम्र के लायक साहित्य से उनका कोई परिचय नहीं होता। कक्षा-कक्ष अवलोकन के दौरान एक अनुभव को यहाँ बाँटना चाहेंगे। हमने बच्चों से पूछा कहानी सुनोगे या कविता? उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। अत: हमने एक कहानी सुना दी। दूसरे दिन फिर उसी कक्षा में जाने पर बच्चों ने कहा हमें कविता सुनाइए। कविता सुनाना शुरू किया तो उनका कहना था कल वाली सुनाइए। यह उदाहरण बताता है कि बच्चों को कहानियाँ और कविताएँ सुनने की बहुत इच्छा होती है। लेकिन क्योंकि हम साहित्य का कक्षा में अर्थपूर्ण उपयोग नहीं कर पाते हैं, अत: उनकी रुचि खत्म हो जाती है। बच्चों को विभिन्न कविताओं, कहानियों के मुख्य बिन्दुओं को याद करने का कार्य अरुचिकर व बोरिंग होता है और विशेषतौर पर तब जब यह उसके जैसा ही हो जो उनको पढ़ाया गया है। साहित्य के उद्देश्य जैसे कि खुद को समझना और खुद का दुनिया के बारे में दृष्टिकोण बनाना और उसका संवर्धन करना इत्यादि कहीं गुम हो जाते हैं।
कविता,कहानी की किताबें हो या अखबार अथवा सड़कों, विभिन्न स्थानों पर लिखे गए निर्देश इस तरह के सन्दर्भ न तो कक्षा में उपलब्ध होते हैं ना ही उनके बारे में सोचा जाता है। पाठ्यपुस्तक में कुछ जरूर मदद मिलती है लेकिन उसकी भी अपनी सीमाएँ होती हैं। अत:शिक्षक को यह सोचना होगा कि बच्चों में भाषा के प्रयोग की क्षमताएँ बढ़ाने के लिए उन्हें पाठ्यपुस्तक के अतिरिक्त क्या-क्या करने की आवश्यकता है।
उच्च
प्राथमिक कक्षाओं में भाषा शिक्षण:
भाषा को अक्सर अभिव्यक्ति का माध्यम भर माना जाता है और इसी के अनुरूप भाषा की कक्षाओं की शिक्षण प्रक्रिया संचालित होती है जहाँ भाषा को केवल एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। पाठ्यपुस्तक साधन की बजाय साध्य बनकर रह जाती है और सारा ध्यान भाषा सीखने की बजाय पाठ के पीछे के अभ्यास हल करने तथा उच्चारण और लिपि की शुद्धता तक सीमित होकर रह जाता है।
यदि भाषा की प्रकृति और इसके उद्देश्यों को समझा जाए तो विचारों की अभिव्यक्ति भाषा का एक बेहद छोटा व सीमित क्षेत्र है। भाषा हमारे जीवन में इससे कहीं बढकर काम करती है। भाषा हमारी समझ का आधार है। यह विचार करने, तर्क करने, चिन्तन करने, दूसरे की बात समझने जैसे बहुत से काम करती है। दूसरे शब्दों में भाषा हमारे समूचे जीवन का आधार है। भाषा हमें समाज से जोड़ती है, समाज में अपना स्थान सुनिश्चित करने में मदद करती है और भाषा को इस स्तर तक विकसित करने की जिम्मेवारी विद्यालयों की मानी जाती है। बच्चे जब विद्यालय में आते हैं तो उनकी अपनी भाषा पर (मौखिक) उनका पूर्ण अधिकार होता है, वह अपनी भाषा में वाक्यों की रचना और व्याकरण की पूर्ण समझ रखते हैं। हाँ किताबों या विद्यालय की भाषा जरूर उनके लिए अपरिचित हो सकती है, उन्हें उसे सीखने में प्रारंभिक स्तर पर कठिनाई भी महसूस हो सकती है। यहाँ बच्चों की भाषा और पुस्तकों की भाषा (मानक भाषा) के बीच पुल बनाने और बच्चों को आसानी से इस पार लेकर आने के लिए भाषा शिक्षक की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण हो जाती है। इन कक्षाओं का माहौल और शिक्षण प्रक्रियाएँ ऐसी होनी चाहिए जो बच्चे की भाषा सीखने में रुचि बढ़ाए, भाषा सीखना उसे सहज-सरल प्रतीत हो और वह उस भाषा में स्वयं के विचार अभिव्यक्त कर सकें ।
भाषा की कक्षा में संवाद का महत्त्व:
किसी भी भाषा को सीखने के लिए उस भाषा से परिचित होना आवश्यक होता है और यह काम कक्षा में संवाद से ही किया जा सकता है। कक्षा का संवाद बच्चों की मौखिक अभिव्यक्ति को मजबूती देता है, भाषा से परिचित कराता है और सीखे गए को अनुभव से जोड़ने में मदद करता है। इसके लिए भाषा की कक्षा में परस्पर संवाद होना एक आवश्यक और महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यह संवाद शिक्षक-विद्ययार्थी/ विद्यार्थियों या परस्पर विद्यार्थियों के मध्य भी हो सकता है मगर यह संवाद केवल शिक्षक द्वारा प्रश्न पूछने और बच्चों द्वारा उनके एक शब्द या वाक्य में उत्तर देने तक सीमित नहीं होने चाहिए। इस संवाद का आशय बच्चों की शिकायतों को सुनकर उनका समाधान करने से भी नहीं है। इस मुखर संवाद के लिए पाठ्यपुस्तक से परे जाकर चर्चा के मुद्दे खोजना और उन पर कक्षा में स्वस्थ चर्चा का आयोजन करना भाषा शिक्षक के लिए सहायक होगा। जैसे आसपास या गाँव / शहर में घटी किसी महत्वपूर्ण घटना को चर्चा का विषय बनाया जा सकता है। यह चर्चा स्वयमेव ही यदि किसी पाठ से जुड़ती हो तो और भी अच्छा होगा। जैसे यदि किसी कक्षा की पाठ्यपुस्तक में जल को लेकर कोई कविता संकलित है तो पाठ पढ़ाने से पहले बच्चों से पानी को लेकर चर्चा की जा सकती है। इसमें सामान्य जानकारी वाले कुछ प्रश्नों सहित (जैसे आपके घर में दैनिक उपयोग के लिए पानी कहाँ से आता है, आपके गाँव में कौन सी नदी है) ऐसे भी प्रश्न शामिल हो जो बच्चों को सोचने, कल्पना करने के लिए प्रोत्साहित करते हों (जैसे यदि सारा पानी बर्फ बन जाए तो क्या होगा, सारा पानी खत्म हो जाए तो क्या होगा, यदि सारी दुनिया पानी-पानी हो जाए तो क्या होगा आदि)। यदि कोई गाँव या स्थान विशेष पानी के कमी से जूझ रहा हो या किसी हिस्से में अति वर्षा हो रही हो तो उसे भी चर्चा में शामिल किया जा सकता है । इन आपदाओं के संभावित कारणों और निदानों पर भी बच्चों के विचार सुने जा सकते हैं ।
अर्थ निर्माण प्रक्रिया एवं लेखन:
पढ़कर अर्थ निर्माण करना भाषा शिक्षण का महत्वपूर्ण कार्य है। इसके लिए आवश्यक है कि किसी भी साहित्यिक रचना को पढ़ाते समय स्वयं अर्थ बताने की बजाय उसके सन्दर्भों को बच्चों के पूर्व ज्ञान से जोड़कर, अनुमान लगाकर चर्चा द्वारा बच्चों से ही अर्थ निर्माण करवाने का प्रयास करवाना चाहिए। ऐसा करने से बच्चे विषयवस्तु को केवल रटने की बजाय समझकर पढ़ पा रहे होंगे, अर्थ समझने के कारण रचना में निहित भाव को भी ग्रहण कर पा रहे होंगे और इस अर्थ को स्वयं सृजित करने का आनन्द भी ले पा रहे होंगे। जब उन्हें विविध प्रकार के साहित्य से परिचित करवाया जाए (पुस्तकों या अन्य रचनाओं की कटिंग के द्वारा) तो वे स्व प्रयास से उनमें निहित अन्तर को समझ सकें और उनका आनन्द ले सकें यहीं शिक्षक का प्रयास होना चाहिए। भाव किस तरह अभिव्यक्ति में प्रमुख भूमिका निभाते हैं यह भी उदाहरणों द्वारा बताया जा सकता है, किसी नाटक या कहानी की भावपूर्ण प्रस्तुति द्वारा भी इस बात को सामने रखा जा सकता है।
लिखना भाषा के आवश्यक कौशलों में से एक है मगर यहाँ सुसंगतता का आशय केवल लिपि या व्याकरण की शुद्धता से ही नहीं है वरन बच्चे अपनी बात को कितनी अच्छी तरह से लिखकर बता पा रहे हैं यह देखना महत्वपूर्ण है। प्राथमिक कक्षाओं में अपनी बात लिखने के अवसर उपलब्ध कराए जाने आवश्यक हैं। बच्चे जो कुछ लिखते हैं उनमें की गई वर्तनीगत गलतियों के लिए बार-बार टोकने या कापी पर लाल निशान बनाने से बच्चे हतोत्साहित हो सकते हैं और अपने मन की बात लिखने में संकोच करने लगते हैं। इससे बचने के लिए भाषा शिक्षक का यह दायित्व बनता है कि वह बच्चे की अभिव्यक्ति को वर्तनीगत अशुद्धियों से अधिक महत्व दें, गलतियों को केवल निशान लगाकर अंकित करने की बजाय उनके कारणों को समझें (बच्चे वह गलती क्यों कर रहे हैं) और उनका निदान करने का प्रयास करें। अक्सर देखा गया है कि बच्चे को जितने अधिक लिखने-पढ़ने के अवसर मिलते हैं, शब्दों की छवियाँ उसके मस्तिष्क में अंकित हो जाती हैं और वह अपने ही प्रयासों से वर्तनीगत अशुद्धियाँ दूर कर लेता है। यहाँ शिक्षक को बस इतना करना होता है कि उसमें पढने-लिखने की रुचि भर जागृत करें।
भाषा की कक्षा में सवाल-जवाब:
हमारे परिवेश में सामान्यतः तर्क करना या प्रश्न करना उचित नहीं समझा जाता मगर हम अकसर यह भूल जाते हैं कि अपनी बात को तर्क के साथ रख पाना या असहमति को प्रश्नों द्वारा द्वारा स्पष्ट कर पाना भाषा का एक महत्वपूर्ण कौशल है। यह कौशल जीवन में भी महत्वपूर्ण है और जिसे केवल अवसर और अभ्यास ही निखार सकते हैं अतः कक्षाकक्ष में बच्चों को तर्क करने के, प्रश्न करने के भरपूर अवसर उपलब्ध होने चाहिए। इसके लिए शिक्षक का बच्चों से मित्रवत व्यवहार होना और बच्चों को बोलने के अवसर मिलना आवश्यक है। साथ ही साथ बच्चों को यह भी विश्वास दिलाना जरुरी है कि उनकी बात को सुना जाएगा, सम्मान दिया जाएगा और उनके प्रश्नों का भी समाधान किया जाएगा।
सम्प्रेषण के अर्थ के हिसाब से देखें तो भी कम से कम बच्चों को कक्षा में अपनी बात कहने, दूसरों की बात सुनने, प्रश्न उठाने, तर्क करने इत्यादि की स्वतन्त्रता होनी चाहिए। पर कक्षाओं में तो यह नहीं होता। कक्षा में जो होता है वह है: अध्यापक जो कहे उसको बिना विचारे सुनना, पाठ्यपुस्तक के अध्यायों के पीछे दिए गए अभ्यास के प्रश्नों के ‘सही’ उत्तर याद करके उनको हूबहू परीक्षा में वैसा ही लिखना। इसके लिए तो पाठ्यपुस्तक की आवश्यकता ही नहीं होती। उत्तर याद करने के लिए बच्चे कुँजियों का सहारा लेते हैं और इसी वजह से कुँजियों का बाजार चलता है।
वास्तव में भाषा हमारे जीवन का आधार है अतः भाषा शिक्षकों को बहुत संवेदनशील और रचनात्मक होना चाहिए ताकि वे न केवल भाषा शिक्षण के उद्देश्यों को प्राप्त कर सकें वरन बच्चे को सुसंगत भाषा का उपहार भी प्रदान कर सकें।

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